कृषि विज्ञान केंद्र, ललितपुर में गाजरघास उन्मूलन जागरूकता सप्ताह के तहत विशेष कार्यक्रम का आयोजन.

बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बाँदा के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, ललितपुर में 21वें गाजरघास उन्मूलन जागरूकता सप्ताह (16-22 अगस्त 2026) के तीसरे दिन 19 अगस्त 2026 को विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।

केंद्राध्यक्ष डॉ. मुकेश चंद के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य 'गाजरघास मुक्त के.वी.के. परिसर' बनाना था।

यह आयोजन भा.कृ.अनु.प.-खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर, भा.कृ.अनु.प.-अटारी, कानपुर और निदेशक प्रसार, बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के निर्देशों के अनुपालन में किया गया।कार्यक्रम के नोडल अधिकारी और विषय वस्तु विशेषज्ञ (सस्य) डॉ.

दिनेश तिवारी ने गाजरघास (कांग्रेस घास, सफ़ेद टोपी, गजरी, चटक चांदनी, रुखैया) के खतरों पर तकनीकी जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि 1950 के दशक में भारत में पहली बार देखी गई यह विदेशी खरपतवार वर्तमान में लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर फसलीय और गैर-फसलीय क्षेत्रों में फैल चुकी है।

यह पौधा 1.5 से 2.0 मीटर तक लंबा होता है और प्रति पौधा 25,000 से 50,000 बीज उत्पन्न करने की क्षमता रखता है, जो हवा, पानी और मानवीय गतिविधियों से तेजी से फैलते हैं।डॉ.

तिवारी ने स्वास्थ्य और कृषि पर इसके दुष्प्रभावों को रेखांकित करते हुए बताया कि यह मनुष्यों में त्वचा रोग (डर्मेटाइटिस), अस्थमा और ब्रोंकाइटिस का कारण बनता है।

पशुओं में इसके सेवन से अत्यधिक लार, दस्त और मुँह में छाले हो जाते हैं। साथ ही, यह चरागाहों और वन क्षेत्रों में चारे की उपलब्धता को भी कम कर रहा है।नियंत्रण के उपायों पर चर्चा करते हुए डॉ.

तिवारी ने सामुदायिक पहल पर जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि फूल आने से पहले गाजरघास को उखाड़कर कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट बनाया जा सकता है।

इसके अलावा, चकौड़ा और गेंदा जैसे प्रतिस्पर्धी पौधों के बीजों का छिड़काव करके इसे विस्थापित किया जा सकता है।

रासायनिक नियंत्रण के लिए अकृषित क्षेत्रों में ग्लाइफोसेट (1.0 से 1.5 प्रतिशत) और मिश्रित वनस्पति में मैट्रीब्यूजिन (0.3 से 0.5 प्रतिशत) या 2, 4-डी (0.3 से 0.5 प्रतिशत) का छिड़काव फूल आने से पहले करने की सलाह दी गई।

उन्होंने स्पष्ट किया कि फसलों में शाकनाशियों के प्रयोग से पहले विशेषज्ञों से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

जैविक नियंत्रण के लिए जुलाई-अगस्त के दौरान 'जाइगोग्रामा बाइकोलोराटा' (मेक्सिकन बीटल) कीट को संक्रमित क्षेत्रों में छोड़ा जा सकता है।केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष डॉ.

मुकेश चंद ने प्रतिभागियों को गाजरघास से होने वाले नुकसान के प्रति सचेत किया और किसानों को इस अभियान से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कृषकों को केंद्र से निरंतर संपर्क में रहकर वैज्ञानिक और तकनीकी जानकारी प्राप्त करने का सुझाव दिया।इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग, ललितपुर के अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ-साथ 'आत्मा' योजना के अंतर्गत विकासखंड मड़ावरा से आए 90 से अधिक कृषक बंधुओं और कृषक महिलाओं ने सक्रिय रूप से प्रतिभाग किया।

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Surendra Sapera

@saperasurendra50

Reporter Lalitpur Up

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