विदिशा: शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री और रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य में मानवता, संवेदना और नैतिक संस्कार पैदा करना है। आधुनिक शिक्षा के साथ बच्चों को धर्म, संस्कृति और चरित्र निर्माण की शिक्षा देना भी जरूरी है, क्योंकि संस्कारों के बिना शिक्षा अधूरी है। ये विचार मुनि श्री निर्णयसागर महाराज ने श्रावक संस्कार शिक्षण शिविर में दशलक्षण धर्म के चतुर्थ दिवस की प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किए।
मुनि श्री ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति रेल यात्रा के दौरान स्टेशन पर उतरा तो अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। रात होने और रास्ता खराब होने के कारण उसने स्टेशन मास्टर से प्लेटफॉर्म पर रुकने की अनुमति मांगी और बताया कि उसके पास एक लाख रुपये हैं, जो रास्ते में लुट गए तो उसका परिवार संकट में पड़ जाएगा। एक लाख रुपये की बात सुनते ही स्टेशन मास्टर के मन में लालच जाग उठा। मुनि श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से स्पष्ट किया कि पढ़ा-लिखा होना अलग बात है और संस्कारित होना अलग। यदि शिक्षा मनुष्य के भीतर ईमानदारी और मानवता नहीं जगा पाती, तो वह अधूरी है।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पहले बच्चों को बचपन से ही दया, ईमानदारी, संयम और सदाचार के संस्कार दिए जाते थे, लेकिन आज कम उम्र में बच्चों को स्कूल भेजने की होड़ मची है। अठारह महीने के बच्चों तक के प्री-स्कूल में प्रवेश की स्थिति है। उन्होंने कहा कि खेल-कूद और आधुनिक शिक्षा के साथ बच्चों को पढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन उनके व्यक्तित्व में संस्कार और मानवीय संवेदना विकसित हो, इसका ध्यान रखना समाज की जिम्मेदारी है। मुनि श्री ने जोर दिया कि बच्चे अंग्रेजी सीखें, आधुनिक ज्ञान और तकनीक हासिल करें, लेकिन साथ ही अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और नैतिक मूल्यों से भी जुड़े रहें। केवल आधुनिकता अपनाने से व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं होता।
भगवान राम के प्रसंग का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि सीता हरण के बाद भगवान राम वन में पेड़-पौधों, पक्षियों और वन्य जीवों तक से पूछते हैं कि क्या किसी ने सीता को देखा है। यह प्रसंग मनुष्य की संवेदनशीलता और करुणा का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जिसके भीतर प्रेम और करुणा होती है, उसकी संवेदना केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रहती। उन्होंने कहा कि संस्कार शिविर में यदि तीन सौ लोगों में से तीन लोग भी धर्म और सदाचार को अपने जीवन में उतार लेते हैं, तो शिविर की सार्थकता है। बच्चों में धर्म के प्रति रुचि देखकर विश्वास होता है कि पंचम काल में भी धर्म जीवंत रहेगा। उन्होंने माता-पिता और समाज से आह्वान किया कि बच्चों को संस्कार देने का यही सही समय है, क्योंकि आदतें और जीवनशैली बन जाने के बाद परिवर्तन कठिन हो जाता है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि श्रावक संस्कार शिविर में लगभग 300 शिविरार्थी भाग ले रहे हैं। शिविर में प्रातः 5:30 बजे भावनायोग के बाद अभिषेक, शांतिधारा और पर्व पूजन किया गया। भगवान पुष्पदंत स्वामी के निर्वाण कल्याणक महोत्सव पर श्रद्धालुओं ने निर्वाण लाडू अर्पित कर भक्ति और श्रद्धा के साथ पर्व मनाया। उन्होंने बताया कि शहर में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए जैन मिलन विदिशा द्वारा इंद्रप्रस्थ कॉलोनी में शुद्ध भोजन की व्यवस्था की गई है, साथ ही बाहर से आने वाले अतिथियों के लिए भी समाज द्वारा भोजन सहित आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं।
विदिशा: शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री और रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य में मानवता, संवेदना और नैतिक संस्कार पैदा करना है। आधुनिक शिक्षा के साथ बच्चों को धर्म, संस्कृति और चरित्र निर्माण की शिक्षा देना भी जरूरी है, क्योंकि संस्कारों के बिना शिक्षा अधूरी है। ये विचार मुनि श्री निर्णयसागर महाराज ने श्रावक संस्कार शिक्षण शिविर में दशलक्षण धर्म के चतुर्थ दिवस की प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किए।
मुनि श्री ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति रेल यात्रा के दौरान स्टेशन पर उतरा तो अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। रात होने और रास्ता खराब होने के कारण उसने स्टेशन मास्टर से प्लेटफॉर्म पर रुकने की अनुमति मांगी और बताया कि उसके पास एक लाख रुपये हैं, जो रास्ते में लुट गए तो उसका परिवार संकट में पड़ जाएगा। एक लाख रुपये की बात सुनते ही स्टेशन मास्टर के मन में लालच जाग उठा। मुनि श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से स्पष्ट किया कि पढ़ा-लिखा होना अलग बात है और संस्कारित होना अलग। यदि शिक्षा मनुष्य के भीतर ईमानदारी और मानवता नहीं जगा पाती, तो वह अधूरी है।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पहले बच्चों को बचपन से ही दया, ईमानदारी, संयम और सदाचार के संस्कार दिए जाते थे, लेकिन आज कम उम्र में बच्चों को स्कूल भेजने की होड़ मची है। अठारह महीने के बच्चों तक के प्री-स्कूल में प्रवेश की स्थिति है। उन्होंने कहा कि खेल-कूद और आधुनिक शिक्षा के साथ बच्चों को पढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन उनके व्यक्तित्व में संस्कार और मानवीय संवेदना विकसित हो, इसका ध्यान रखना समाज की जिम्मेदारी है। मुनि श्री ने जोर दिया कि बच्चे अंग्रेजी सीखें, आधुनिक ज्ञान और तकनीक हासिल करें, लेकिन साथ ही अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और नैतिक मूल्यों से भी जुड़े रहें। केवल आधुनिकता अपनाने से व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं होता।
भगवान राम के प्रसंग का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि सीता हरण के बाद भगवान राम वन में पेड़-पौधों, पक्षियों और वन्य जीवों तक से पूछते हैं कि क्या किसी ने सीता को देखा है। यह प्रसंग मनुष्य की संवेदनशीलता और करुणा का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जिसके भीतर प्रेम और करुणा होती है, उसकी संवेदना केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रहती। उन्होंने कहा कि संस्कार शिविर में यदि तीन सौ लोगों में से तीन लोग भी धर्म और सदाचार को अपने जीवन में उतार लेते हैं, तो शिविर की सार्थकता है। बच्चों में धर्म के प्रति रुचि देखकर विश्वास होता है कि पंचम काल में भी धर्म जीवंत रहेगा। उन्होंने माता-पिता और समाज से आह्वान किया कि बच्चों को संस्कार देने का यही सही समय है, क्योंकि आदतें और जीवनशैली बन जाने के बाद परिवर्तन कठिन हो जाता है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि श्रावक संस्कार शिविर में लगभग 300 शिविरार्थी भाग ले रहे हैं। शिविर में प्रातः 5:30 बजे भावनायोग के बाद अभिषेक, शांतिधारा और पर्व पूजन किया गया। भगवान पुष्पदंत स्वामी के निर्वाण कल्याणक महोत्सव पर श्रद्धालुओं ने निर्वाण लाडू अर्पित कर भक्ति और श्रद्धा के साथ पर्व मनाया। उन्होंने बताया कि शहर में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए जैन मिलन विदिशा द्वारा इंद्रप्रस्थ कॉलोनी में शुद्ध भोजन की व्यवस्था की गई है, साथ ही बाहर से आने वाले अतिथियों के लिए भी समाज द्वारा भोजन सहित आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं।