विदिशा के श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में पर्युषण पर्व का चौथा दिन भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक मनाया गया और भक्तों ने निर्वाण लाडू चढ़ाया।
मंदिर के प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि निर्वाण कल्याणक के उपरांत मुंबई के पंडित संयम शास्त्री ने समयसार नाटक ग्रंथ पर स्वाध्याय कराया। उन्होंने कहा कि हमारा जीवन अक्सर दुःख में बीतता है, जबकि दुःख का कोई आधार नहीं है। सुख और दुःख वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे मन की कल्पनाओं में निहित हैं।
पंडित संयम शास्त्री ने दुःख से मुक्ति के लिए तीन प्रकार के कर्म विज्ञान को समझने पर जोर दिया:
द्रव्यकर्म: ये आत्मा पर चिपके हुए सूक्ष्म पुद्गल परमाणु हैं, जो दिखाई नहीं देते। यही 8 कर्म और 63 प्रकृतियों का निर्माण कर तय करते हैं कि जीव को कौन सी गति, शरीर और आयु मिलेगी।
नौकर्म: द्रव्यकर्म के उदय से मिलने वाले संयोग, जैसे शरीर, घर, गाड़ी, मोबाइल, पैसा, परिवार और मान-अपमान। उन्होंने बताया कि हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम सीमित नौकर्मों को ही चाहते हैं, जबकि नौकर्मों की प्राप्ति का नियंत्रण द्रव्यकर्म के पास है।
भावकर्म: नौकर्म को पाने या न पाने पर हमारे मन में उठने वाले भाव, जैसे राग, द्वेष, क्रोध, खुशी और गम। इस पर हमारा पूर्ण नियंत्रण है। हम कर्म के उदय या उससे मिली वस्तु को तो नहीं बदल सकते, लेकिन उसे जानने के बाद उससे प्रभावित होना है या नहीं, यह हमारे हाथ में है।
प्रवचन के अंत में पंडित बनारसीदास जी के पद का उल्लेख करते हुए बताया गया कि जिसने भेदविज्ञान की कला पा ली, उसकी बुद्धि सोने के समान हो जाती है। वह पराई वस्तुओं में अपनापन छोड़कर आत्मरस में मगन हो जाता है। उन्होंने कहा कि परिस्थिति नहीं, बल्कि अपनी मनःस्थिति बदलने की आवश्यकता है।
सायंकालीन प्रवचन में उत्तम शौच धर्म पर प्रकाश डाला गया, जो दस लक्षण धर्म का दूसरा लक्षण है। इसमें बताया गया कि शौच का अर्थ केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धता है। जैन शास्त्रों के अनुसार, आत्मा की सबसे बड़ी अशुद्धता लोभ है। जब तक मन में तृष्णा, जलन और असंतोष है, तब तक आत्मा पवित्र नहीं हो सकती। उत्तम शौच धर्म हमें संतोष रूपी जल से मन को धोने और इच्छाओं को सीमित करने की प्रेरणा देता है।
डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि रात्रि में संगीतमय भक्ति और म्यूजिकल अंताक्षरी का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने सुंदर भजन प्रस्तुत किए। आज रात्रि बच्चों द्वारा नाटक की प्रस्तुति दी जाएगी। ट्रस्ट के अध्यक्ष मलुकचंद जैन ने सभी श्रद्धालुओं से कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है।
विदिशा के श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में पर्युषण पर्व का चौथा दिन भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक मनाया गया और भक्तों ने निर्वाण लाडू चढ़ाया।
मंदिर के प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि निर्वाण कल्याणक के उपरांत मुंबई के पंडित संयम शास्त्री ने समयसार नाटक ग्रंथ पर स्वाध्याय कराया। उन्होंने कहा कि हमारा जीवन अक्सर दुःख में बीतता है, जबकि दुःख का कोई आधार नहीं है। सुख और दुःख वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे मन की कल्पनाओं में निहित हैं।
पंडित संयम शास्त्री ने दुःख से मुक्ति के लिए तीन प्रकार के कर्म विज्ञान को समझने पर जोर दिया:
द्रव्यकर्म: ये आत्मा पर चिपके हुए सूक्ष्म पुद्गल परमाणु हैं, जो दिखाई नहीं देते। यही 8 कर्म और 63 प्रकृतियों का निर्माण कर तय करते हैं कि जीव को कौन सी गति, शरीर और आयु मिलेगी।
नौकर्म: द्रव्यकर्म के उदय से मिलने वाले संयोग, जैसे शरीर, घर, गाड़ी, मोबाइल, पैसा, परिवार और मान-अपमान। उन्होंने बताया कि हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम सीमित नौकर्मों को ही चाहते हैं, जबकि नौकर्मों की प्राप्ति का नियंत्रण द्रव्यकर्म के पास है।
भावकर्म: नौकर्म को पाने या न पाने पर हमारे मन में उठने वाले भाव, जैसे राग, द्वेष, क्रोध, खुशी और गम। इस पर हमारा पूर्ण नियंत्रण है। हम कर्म के उदय या उससे मिली वस्तु को तो नहीं बदल सकते, लेकिन उसे जानने के बाद उससे प्रभावित होना है या नहीं, यह हमारे हाथ में है।
प्रवचन के अंत में पंडित बनारसीदास जी के पद का उल्लेख करते हुए बताया गया कि जिसने भेदविज्ञान की कला पा ली, उसकी बुद्धि सोने के समान हो जाती है। वह पराई वस्तुओं में अपनापन छोड़कर आत्मरस में मगन हो जाता है। उन्होंने कहा कि परिस्थिति नहीं, बल्कि अपनी मनःस्थिति बदलने की आवश्यकता है।
सायंकालीन प्रवचन में उत्तम शौच धर्म पर प्रकाश डाला गया, जो दस लक्षण धर्म का दूसरा लक्षण है। इसमें बताया गया कि शौच का अर्थ केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धता है। जैन शास्त्रों के अनुसार, आत्मा की सबसे बड़ी अशुद्धता लोभ है। जब तक मन में तृष्णा, जलन और असंतोष है, तब तक आत्मा पवित्र नहीं हो सकती। उत्तम शौच धर्म हमें संतोष रूपी जल से मन को धोने और इच्छाओं को सीमित करने की प्रेरणा देता है।
डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि रात्रि में संगीतमय भक्ति और म्यूजिकल अंताक्षरी का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने सुंदर भजन प्रस्तुत किए। आज रात्रि बच्चों द्वारा नाटक की प्रस्तुति दी जाएगी। ट्रस्ट के अध्यक्ष मलुकचंद जैन ने सभी श्रद्धालुओं से कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है।