कुंडलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने ‘जीवन क्या है’ श्रृंखला के अंतर्गत ‘जीवन एक कर्तव्य है’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जीवन में कर्तव्य केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि अपनी भूमिका और दायित्व को समझकर उसे निष्ठा से निभाना है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को अंतरात्मा से स्वीकार करता है, तो वही कर्तव्य उसकी जिम्मेदारी बन जाता है।
मुनि श्री ने कर्नाटक के एक साइकिल सुधारक कल्लप्पा का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि सड़क के गड्ढों के कारण एम्बुलेंस समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी और दुर्घटना में उनके बेटे की मृत्यु हो गई। बेटे को खोने के बाद कल्लप्पा ने सरकार को दोष देने के बजाय स्वयं अपनी साइकिल पर गिट्टी और सीमेंट रखकर सड़क के गड्ढे भरना शुरू कर दिया। लोगों के पूछने पर कि यह काम सरकार और लोक निर्माण विभाग का है, कल्लप्पा ने कहा कि सड़क बनाना सरकार की ड्यूटी हो सकती है, लेकिन किसी अन्य बेटे-बेटी की जान इन गड्ढों के कारण न जाए, यह उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के हजारों गड्ढे भरे और ‘गड्ढों के राजा’ के रूप में पहचान बनाई।
मुनि श्री ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि आत्मा को कर्मों के बंधन से बचाना मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है। श्रावक धर्म और मुनि धर्म के नियम आत्मा के सुरक्षा कवच हैं। स्वाध्याय, सामायिक, संयमित आहार-विहार तथा धार्मिक अनुशासन के माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति जिम्मेदार बनता है। इसके लिए तीन बातें आवश्यक हैं—पहली, अपने सुख-दुख और परिस्थितियों के लिए अपने कर्मों की जवाबदेही स्वीकार करना। दूसरी, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को जागरूक होकर रोकना तथा तप के माध्यम से पुराने कर्मों का क्षय करना। तीसरी, बाहरी प्रभावों से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वभाव की ओर लौटना। उन्होंने कहा कि इन भावों से ऊपर उठकर शुद्ध आत्म-अनुभूति प्राप्त करना और मोक्ष की ओर बढ़ना ही अपने प्रति सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
मुनि श्री ने वर्तमान सामाजिक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कर्तव्य और जिम्मेदारी के सूक्ष्म अंतर को न समझ पाने के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में असंतुलन है। अधिकारों के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन जिम्मेदारियों को भुलाया जा रहा है। परिवारों में वृद्ध माता-पिता की सेवा और अपनों के प्रति संवेदना कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि पैसा, मकान और वाहन परिवार में आई आत्मीयता की कमी को पूरा नहीं कर सकते।
मुनि श्री ने सुझाव दिया कि अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को समझने के लिए जैन परंपरा में बताई गई बारह भावनाओं का चिंतन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति एक साथ पुत्र, पिता, पति और कर्मचारी हो सकता है, लेकिन हर परिस्थिति में एक भूमिका प्रमुख होती है। कार्यालय में कार्य के प्रति जिम्मेदारी प्रमुख है और घर पर परिवार के प्रति। भूमिकाओं को आपस में मिलाने के बजाय परिस्थितिनुसार उनका संतुलन बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस दिन व्यक्ति अनेकांतवाद से विचारों को, अपरिग्रह से इच्छाओं को और ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ के सिद्धांत से अपने कर्मों को अनुशासित कर लेगा, उसी दिन जीवन व्यवस्थित, आनंदमय और शांत हो जाएगा।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि ‘जीवन क्या है’ श्रृंखला के माध्यम से मुनि श्री समतासागर महाराज जीवन के विविध पक्षों को जैन दर्शन से जोड़कर व्यावहारिक दृष्टि प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि आगामी 16 से 25 सितंबर तक दशलक्षण पर्व के अवसर पर मुनि संघ के सान्निध्य में श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इस शिविर में लगभग 1200 शिविरार्थियों के भाग लेने की व्यवस्था की गई है। शिविर का उद्देश्य श्रावकों को धर्म, संस्कार, अनुशासन और आत्मचिंतन से जोड़ते हुए जीवन को अधिक संयमित एवं सार्थक बनाने का अवसर प्रदान करना है।
कुंडलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने ‘जीवन क्या है’ श्रृंखला के अंतर्गत ‘जीवन एक कर्तव्य है’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जीवन में कर्तव्य केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि अपनी भूमिका और दायित्व को समझकर उसे निष्ठा से निभाना है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को अंतरात्मा से स्वीकार करता है, तो वही कर्तव्य उसकी जिम्मेदारी बन जाता है।
मुनि श्री ने कर्नाटक के एक साइकिल सुधारक कल्लप्पा का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि सड़क के गड्ढों के कारण एम्बुलेंस समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी और दुर्घटना में उनके बेटे की मृत्यु हो गई। बेटे को खोने के बाद कल्लप्पा ने सरकार को दोष देने के बजाय स्वयं अपनी साइकिल पर गिट्टी और सीमेंट रखकर सड़क के गड्ढे भरना शुरू कर दिया। लोगों के पूछने पर कि यह काम सरकार और लोक निर्माण विभाग का है, कल्लप्पा ने कहा कि सड़क बनाना सरकार की ड्यूटी हो सकती है, लेकिन किसी अन्य बेटे-बेटी की जान इन गड्ढों के कारण न जाए, यह उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के हजारों गड्ढे भरे और ‘गड्ढों के राजा’ के रूप में पहचान बनाई।
मुनि श्री ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि आत्मा को कर्मों के बंधन से बचाना मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है। श्रावक धर्म और मुनि धर्म के नियम आत्मा के सुरक्षा कवच हैं। स्वाध्याय, सामायिक, संयमित आहार-विहार तथा धार्मिक अनुशासन के माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति जिम्मेदार बनता है। इसके लिए तीन बातें आवश्यक हैं—पहली, अपने सुख-दुख और परिस्थितियों के लिए अपने कर्मों की जवाबदेही स्वीकार करना। दूसरी, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को जागरूक होकर रोकना तथा तप के माध्यम से पुराने कर्मों का क्षय करना। तीसरी, बाहरी प्रभावों से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वभाव की ओर लौटना। उन्होंने कहा कि इन भावों से ऊपर उठकर शुद्ध आत्म-अनुभूति प्राप्त करना और मोक्ष की ओर बढ़ना ही अपने प्रति सर्वोच्च जिम्मेदारी है।
मुनि श्री ने वर्तमान सामाजिक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कर्तव्य और जिम्मेदारी के सूक्ष्म अंतर को न समझ पाने के कारण व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में असंतुलन है। अधिकारों के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन जिम्मेदारियों को भुलाया जा रहा है। परिवारों में वृद्ध माता-पिता की सेवा और अपनों के प्रति संवेदना कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि पैसा, मकान और वाहन परिवार में आई आत्मीयता की कमी को पूरा नहीं कर सकते।
मुनि श्री ने सुझाव दिया कि अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को समझने के लिए जैन परंपरा में बताई गई बारह भावनाओं का चिंतन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति एक साथ पुत्र, पिता, पति और कर्मचारी हो सकता है, लेकिन हर परिस्थिति में एक भूमिका प्रमुख होती है। कार्यालय में कार्य के प्रति जिम्मेदारी प्रमुख है और घर पर परिवार के प्रति। भूमिकाओं को आपस में मिलाने के बजाय परिस्थितिनुसार उनका संतुलन बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस दिन व्यक्ति अनेकांतवाद से विचारों को, अपरिग्रह से इच्छाओं को और ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ के सिद्धांत से अपने कर्मों को अनुशासित कर लेगा, उसी दिन जीवन व्यवस्थित, आनंदमय और शांत हो जाएगा।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि ‘जीवन क्या है’ श्रृंखला के माध्यम से मुनि श्री समतासागर महाराज जीवन के विविध पक्षों को जैन दर्शन से जोड़कर व्यावहारिक दृष्टि प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि आगामी 16 से 25 सितंबर तक दशलक्षण पर्व के अवसर पर मुनि संघ के सान्निध्य में श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इस शिविर में लगभग 1200 शिविरार्थियों के भाग लेने की व्यवस्था की गई है। शिविर का उद्देश्य श्रावकों को धर्म, संस्कार, अनुशासन और आत्मचिंतन से जोड़ते हुए जीवन को अधिक संयमित एवं सार्थक बनाने का अवसर प्रदान करना है।