दीक्षा और आचार्य पदग्रहण दिवस गुणों की अनुमोदना, जन्मदिन शरीर की धारणा का प्रतीक
विदिशा। आगामी 16 सितंबर से दशलक्षण पर्व प्रारंभ होने जा रहा है। इस अवसर पर विदिशा के जैन समाज द्वारा धर्माराधना, स्वाध्याय, संयम एवं आत्मचिंतन से जुड़े विभिन्न धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि दशलक्षण पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है और समाजजनों से पर्व को धार्मिक एवं संस्कारमय वातावरण में मनाने का आह्वान किया गया है।
मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने कहा कि दशलक्षण पर्व केवल पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और जीवन में सद्गुणों को जागृत करने का पर्व है। जैन दर्शन में व्यक्ति की नहीं, बल्कि उसके गुणों की उपासना की जाती है। इसलिए धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य बाहरी उत्सव के साथ आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि शरीर को आत्मा मान लेना मिथ्यात्व है। शरीर पुद्गल है, जबकि आत्मा चेतन और शाश्वत है। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसका शरीर नहीं, बल्कि उसका आत्मस्वरूप है। आत्मा और शरीर के भेद को समझना अध्यात्म की मूल साधना है। जब व्यक्ति स्वयं को शरीर से अलग आत्मतत्व के रूप में पहचानने का प्रयास करता है, तभी उसकी आध्यात्मिक प्रगति प्रारंभ होती है।
दीक्षा दिवस संत के गुणों की अनुमोदना
दीक्षा दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि किसी संत का दीक्षा दिवस उनके संयम, त्याग और रत्नत्रय धारण करने की अनुमोदना का अवसर है। संत ने संसार के आकर्षणों से ऊपर उठकर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया है। उनके दीक्षा दिवस पर उनके त्याग और संयम की अनुमोदना करना स्वयं के भीतर धर्म और संयम के संस्कारों को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि आचार्य पदग्रहण दिवस भी केवल किसी पद की स्मृति का अवसर नहीं है। आचार्य स्वयं संयम और धर्म का आचरण करते हुए समाज को धर्म, मुनि दीक्षा और आत्मकल्याण की प्रेरणा देते हैं। इसलिए आचार्य पदग्रहण दिवस उनके गुणों, त्याग और समाज के प्रति उनके आध्यात्मिक योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।
जन्मदिन और जन्म कल्याणक में अंतर समझें
मुनि श्री ने जन्मदिन को लेकर भी विवेक रखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सामान्य जन्म शरीर का होता है। शरीर पुद्गल है और उसकी उत्पत्ति के साथ उसका नाश भी निश्चित है। इसलिए शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेना तत्व की दृष्टि से भूल है।
उन्होंने कहा कि जैन परंपरा में तीर्थंकरों के जन्म कल्याणक सामान्य जन्मोत्सव नहीं हैं। वे तीर्थंकरों के महान गुणों की आराधना, वंदना और उनके जीवन से प्रेरणा लेने के अवसर हैं। जन्म कल्याणक और सामान्य जन्मोत्सव के भाव को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
मुनि श्री ने बच्चों के जन्मोत्सव को भी धर्म और संस्कार से जोड़ने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि बच्चे के प्रथम जिनदर्शन और प्रथम अभिषेक के दिन को ‘मंदिर दिवस’ के रूप में मनाने की परंपरा विकसित की जा सकती है। इससे बच्चों में बचपन से ही जिनालय, जिनेंद्र भगवान और धर्म के प्रति श्रद्धा एवं आत्मीयता विकसित होगी।
दशलक्षण पर्व में करें आत्मनिरीक्षण
मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण पर्व आत्मनिरीक्षण का अवसर है। इन दिनों में व्यक्ति को अपने भीतर झांककर क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कमजोरियों को पहचानना चाहिए तथा उन्हें कम करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। पूजा, विधान और धार्मिक क्रियाओं के साथ स्वाध्याय, संयम, विनय और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाना ही पर्व की वास्तविक सार्थकता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से पवित्र ग्रंथों का नियमित अध्ययन और मनन करने का आग्रह किया। गुरु की वाणी सुनने के लिए समय निकालना भी साधना है। उन्होंने कहा कि गुरु की वाणी सुनना पहला चरण है, लेकिन उसे अपने आचरण में उतारना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। आत्मकल्याण के अवसर को जीवन परिवर्तन का माध्यम बनाना चाहिए।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से दशलक्षण पर्व के दौरान आत्मा और शरीर के भेद का चिंतन करने, संतों एवं आचार्यों के गुणों की अनुमोदना करने तथा धार्मिक आयोजनों को संस्कार और आत्मकल्याण से जोड़ने का आह्वान किया।

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