बच्चे पेंसिल से क्यों लिखते हैं? आचार्य श्री विनम्रसागरजी ने बताया इसके पीछे का कारण

अच्छी संगति, सकारात्मक विचार और सरलता से जीवन होता है सार्थक: आचार्य विनम्रसागरजी

छत्रपति संभाजीनगर, 10 अगस्त। संसार में केवल जन्म लेना ही जीवन की सार्थकता नहीं है। जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझकर उसके अनुरूप आचरण करने वाला मनुष्य ही अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। सफलता स्वयं चलकर हमारे पास नहीं आती, बल्कि इसे प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थपूर्वक आगे बढ़ना पड़ता है। ज्ञान, सम्यक्त्व और समाधि की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ आवश्यक है। ये विचार परम पूज्य उच्चारणाचार्य श्री विनम्रसागरजी गुरुदेव ने धर्मसभा में व्यक्त किए।

धर्मसभा में मार्गदर्शन करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि मानव शरीर में विष भी बनता है और अमृत भी। मन में उत्पन्न होने वाले विचारों का शरीर और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। नकारात्मक विचारों से मन में अशांति उत्पन्न होती है, जबकि अच्छे, सकारात्मक और पवित्र विचारों से शरीर एवं मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए मनुष्य को अपने विचारों के प्रति अत्यंत सजग रहना चाहिए।

आचार्यश्री ने कहा कि अच्छे व्यक्तियों के साथ रहने से मन अधिक शांत और प्रसन्न रहता है। संत-महात्माओं के सान्निध्य में रहने से विचारों में सकारात्मक परिवर्तन आता है। इसके विपरीत नकारात्मक विचार रखने वाले व्यक्तियों की संगति का प्रभाव भी हमारे मन पर पड़ता है। इसलिए जीवन में सत्संग, संत-सान्निध्य और सकारात्मक विचारों को विशेष महत्व देना चाहिए।

आचार्यश्री ने जीवन को स्पर्श करने वाला उदाहरण देते हुए कहा कि बच्चे पेंसिल से लिखते हैं और बड़े होने पर पेन से लिखते हैं। पेंसिल से लिखी गई गलती को रबर से आसानी से मिटाया जा सकता है। उसी प्रकार बचपन में की गई गलतियों को सुधारने के अवसर अधिक होते हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के बाद की गई गलतियों को मिटाना या उनके परिणामों को बदलना आसान नहीं होता। इसलिए जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनसे सीखना, स्वयं में सुधार करना और अहंकार से दूर रहना आवश्यक है।

आचार्यश्री ने कहा कि भगवान के समक्ष स्वयं को एक निर्दोष बालक के समान रखकर, अहंकार त्यागकर और मन को निर्मल बनाकर जीवन के अनेक दोष एवं विकारों को दूर करने में सहायता मिलती है। उन्होंने कहा कि जीवन में केवल भौतिक सफलता प्राप्त करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि जीवन को सही दिशा देना अधिक महत्वपूर्ण है। विचारों की शुद्धता, अच्छी संगति, संतों का सान्निध्य और आत्मचिंतन से जीवन वास्तविक अर्थों में सुंदर और सार्थक बनता है।

इस दौरान महावीरजी पाटणी ने जानकारी दी कि बच्चों के लिए बाल संस्कार शिविर तथा महिलाओं के लिए महिला संस्कार शिविर का आयोजन किया गया है। इन संस्कारमय उपक्रमों में समाज के अधिक से अधिक बच्चों, महिलाओं एवं समाजबंधुओं को सहभागी बनने का आह्वान किया गया।

सत्संग से विचार बदलते हैं, विचारों से आचरण बदलता है और आचरण से जीवन बदलता है। इस प्रेरणादायी संदेश के साथ धर्मसभा संपन्न हुई। इसकी जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी।

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शोभित जैन

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विदिशा REPORTER

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