अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा: कान में घुला जहर लाइलाज, संतों का सानिध्य है आत्मा की सुरक्षाऔरंगाबाद (पुष्पगिरी, सोनकच्छ)।
पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज के सानिध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज वर्तमान में पुष्पगिरी तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं।
उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं।
इसी श्रृंखला में आज उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि यदि खाने में कोई जहर मिला दे, तो एक बार उसका इलाज संभव है, लेकिन यदि कान में कोई जहर घोल दे, तो उसका कोई इलाज नहीं है।आचार्य श्री ने आगे कहा कि संत समाज में भक्तों की श्रद्धा, भक्ति और विश्वास की रक्षा करने के लिए आते हैं।
जिस प्रकार एक पहरेदार का कार्य अपने मालिक के माल और जान की रक्षा करना होता है, उसी प्रकार संत समाज में आकर मनुष्य के धर्म, संस्कार और आत्मिक संपदा की रक्षा करते हैं।आचार्य श्री ने विषय-विकारों पर चर्चा करते हुए कहा कि बाहर बहुत से चोर, लुटेरे, डाकू और तस्कर घूम रहे हैं, लेकिन इनसे भी बड़े चोर हमारे भीतर छिपे हुए हैं।
विषय और विकार रूपी ये चोर हमारी जान-माल पर नजर गड़ाए बैठे हैं।
जब समाज अज्ञान और मोह की गहरी नींद में सो रहा होता है, तब संत जागकर पहरा देते हैं और निरंतर 'जागते रहो' का संदेश देते हैं।संत और संतरी के कार्यों में अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि संतरी बाहर के चोरों से जान-माल की रक्षा करता है, जबकि संत हमारे भीतर छिपे विषय, वासना, कषाय, काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी चोरों से रत्नत्रय, धर्म, ज्ञान और वैराग्य रूपी संपदा की रक्षा करते हैं।
संतरी बाहर के चोरों से बचाता है, लेकिन संत भीतर के विषय-विकार और कषाय रूपी चोरों से रक्षा करते हैं।
इसलिए संत का सानिध्य केवल सौभाग्य नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की सुरक्षा का सबसे बड़ा अवसर है।इस कार्यक्रम की जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा और पियूष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी है।