"मोरपंख के प्रयोग में किसी प्रकार की हिंसा नहीं, भ्रांतियों से बचें — मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज"

गिरीडीह "मोरपंख" के उपयोग को लेकर शोसल मीडिया पर उठने वाली शंका का समाधान करते हुए गुणायतन परिसर में विराजमान राष्ट्रीय संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि जैन मुनियों की पिच्छी में प्रयुक्त होने वाला मोरपंख किसी भी प्रकार की हिंसा का परिणाम नहीं है,बल्कि यह मोरों द्वारा स्वाभाविक रूप से त्यागे गए पंखों से प्राप्त होता है।

मुनि श्री यह भी कहा कि वर्तमान में प्रसारित किया जा रहा यह वीडियो 2016 का है,उस समय मोरपंख के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा संसद तक पहुँची थी, किंतु तथ्य सामने आने पर सरकार ने इस विषय को स्थगित कर दिया था।

मुनि श्री ने कहा कि मोरपंख भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक है। दिगंबर जैन मुनियों की पिच्छी तथा भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में इसका प्रयोग प्राचीन काल से होता आया है।

मोरपंख के विषय में स्पस्ट करते हुये कहा कि जैसे मनुष्यों के बाल स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं और काटे जाते हैं, उसी प्रकार मोर भी समय आने पर अपने पुराने पंख स्वयं छोड़ देता है।

एक मोर के शरीर में लगभग 200 से 250 पंख होते हैं और वर्ष में एक या दो बार वे स्वाभाविक रूप से झड़ते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इन पंखों को एकत्रित करते हैं और बाद में यही पंख विभिन्न माध्यमों से बाजार तक पहुँचते हैं।उन्होंने स्पष्ट किया कि मोरपंख प्राप्त करने के लिए मोरों का शिकार किए जाने की धारणा पूरी तरह निराधार है।

यदि किसी मोर की हत्या कर दी जाए तो उसके पंख उपयोग योग्य नहीं रहते।

पिच्छी में वही पंख प्रयुक्त होते हैं जो मोर द्वारा स्वाभाविक रूप से त्यागे गए हों और जिनकी संरचना सुरक्षित रहती है।मुनि श्री ने बताया कि दिगंबर जैन परंपरा में पिच्छी केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि अहिंसा के पालन का साधन है।

पिच्छी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मोरपंख धूल को नहीं पकड़ता, उसमें जीवाणु नहीं पनपते, वह अत्यंत हल्का, कोमल और सुकुमार होता है।

उसकी कोमलता इतनी अधिक होती है कि उससे किसी भी सूक्ष्म जीव को क्षति पहुँचाए बिना स्थान का परिमार्जन किया जा सकता है।उन्होंने कहा कि मुनि जब कहीं बैठते, उठते अथवा कोई वस्तु रखते हैं, तब पिच्छी से स्थान को हल्के से साफ कर लेते हैं ताकि वहाँ उपस्थित सूक्ष्म जीव-जंतुओं की रक्षा हो सके।

यही कारण है कि पिच्छी दिगंबर जैन मुनियों के लिए अहिंसा और जीवदया का महत्वपूर्ण उपकरण है।मुनि श्री ने लोगों से अपील की कि मोरपंख और पिच्छी के संबंध में किसी भी प्रकार की भ्रांति न फैलाएँ।

यदि कोई गलत जानकारी प्रसारित करता है तो उसे तथ्यात्मक जानकारी दें तथा लोगों को जागरूक करें सदियों से दिगंबर जैन मुनियों के हाथ में रहने वाली पिच्छी उनकी पहचान और परंपरा का अभिन्न अंग है तथा इसे सही संदर्भ में समझना आवश्यक है।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया यह संभव है कि किसी ने शरारतपूर्ण दृष्टि से उपरोक्त बी डी ओ पुनः प्रसारित कर अनावश्यक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया हो।

अतः समाज को चाहिए कि किसी भी विषय पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसके तथ्यों की पुष्टि करे।

हो सकता है जिसका यह बी डी ओ है उनको इस बात की जानकारी ही न हो, बिना सत्यापन के किसी संदेश या वीडियो को शोसल मीडिया पर आगे प्रेषित न करें, ताकि समाज में भ्रम और गलतफहमियाँ उत्पन्न न हों।

एवं उपरोक्त संदर्भ में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी को स्थिति स्पष्ट करना चाहिए जिससे समाज में उठ रही भ्रांति समाप्त हो सके

लेखक के बारे में

शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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