विश्व योग दिवस" पर मुनि श्री प्रमाण सागर ने बताया "भावनायोग" का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व

श्री सम्मेद शिखरजी।अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर गुणायतन प्रणेता राष्ट्रीय संत मुनि श्री प्रमाण सागर ने भावनायोग का संदेश देते हुए कहा कि यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि भारत की प्राचीन साधना-पद्धति योग को आज वैश्विक मान्यता प्राप्त हो चुकी है और संपूर्ण विश्व उसका अनुकरण कर रहा है। उन्होंने कहा कि योगासन और शारीरिक अभ्यास शरीर के स्वास्थ्य के लिए निस्संदेह आवश्यक एवं उपयोगी हैं, किंतु केवल शरीर का स्वस्थ होना ही पूर्ण स्वास्थ्य नहीं है।मुनिश्री ने कहा कि यदि केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही पर्याप्त होता, तो संसार के सभी संपन्न और सुविधासंपन्न लोग सदैव प्रसन्न दिखाई देते। वास्तविकता यह है कि बाहरी सुख-सुविधाओं के बीच भी मनुष्य तनाव, चिंता और अवसाद से ग्रस्त है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रसन्नता का संबंध बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से है।उन्होंने भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य की समग्र अवधारणा को स्पष्ट करते हुए आयुर्वेद की प्रसिद्ध परिभाषा उद्धृत की—
“समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥”
अर्थात जिसके शरीर के दोष, अग्नि, धातु और मल-क्रियाएँ संतुलित हों तथा जिसकी आत्मा प्रसन्न, इन्द्रियाँ संयमित और मन शांत हो, वही वास्तव में स्वस्थ कहलाता है।मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश लोगों का ध्यान केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित रह गया है। योगाभ्यास भी मुख्यतः शरीर तक सिमट गया है, जबकि भावनात्मक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य की उपेक्षा की जा रही है। यही कारण है कि योग करने के बाद भी अपेक्षित समग्र स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो पाता।
उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि मनुष्य की अनेक बीमारियों का मूल उसकी भावनाओं और मानसिक स्थिति में निहित है। तनाव, क्रोध, भय, चिंता और अवसाद शरीर को भी रोगग्रस्त बना देते हैं। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली ने मनुष्य को अनेक मनोदैहिक रोगों का शिकार बना दिया है। इसलिए यदि वास्तविक स्वास्थ्य चाहिए तो केवल शरीर नहीं, मन और चेतना को भी स्वस्थ बनाना होगा।मुनिश्री ने बताया कि तन को स्वस्थ बनाने के लिए योगासन आवश्यक हैं, किंतु मन और भावनाओं को स्वस्थ बनाने के लिए भावनायोग की आवश्यकता है। सकारात्मक भावनाएँ, आत्मचिंतन, करुणा, मैत्री, क्षमा, कृतज्ञता और आत्मजागरण भावनायोग के प्रमुख आधार हैं। जब मन निर्मल होगा, भावनाएँ संतुलित होंगी और आत्मा में शांति का अनुभव होगा, तभी समग्र स्वास्थ्य संभव होगा।
उन्होंने कहा कि जीवन में वास्तविक परिवर्तन बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि अपने भावों को बदलने से संभव है। जन्म-जन्मांतरों से चेतना में संचित संस्कार भावों के रूप में प्रकट होते हैं। जैसे भाव होते हैं, वैसे विचार बनते हैं; जैसे विचार होते हैं, वैसा व्यक्तित्व निर्मित होता है और जैसा व्यक्तित्व होता है, वैसा जीवन बन जाता है।वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए मुनिश्री ने कहा कि हमारी भावनाएँ शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियों और नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती हैं। सकारात्मक भावों से सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे रसायनों का स्राव बढ़ता है, जो उत्साह और प्रसन्नता का अनुभव कराते हैं, जबकि भय, चिंता और निराशा जैसे भाव कॉर्टिसोल जैसे तनावकारी हार्मोन को बढ़ाकर मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
उन्होंने न्यूरोप्लास्टिसिटी की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि बार-बार दोहराए जाने वाले विचार और भाव मस्तिष्क में स्थायी न्यूरल पाथवे बना देते हैं। धीरे-धीरे वही व्यक्ति की आदत, व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन जाते हैं। उन्होंने प्लेसिबो और नोसीबो प्रभाव के उदाहरण देकर बताया कि विश्वास और भावनाओं की शक्ति मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है।मुनिश्री ने कहा कि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मोबाइल के एल्गोरिदम भी इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं। हम जिन विषयों पर बार-बार ध्यान देते हैं, वही सामग्री हमारे सामने अधिक आती है। ठीक इसी प्रकार प्रकृति का भी अपना एक अदृश्य एल्गोरिदम है। जिन भावों और विचारों को हम बार-बार अपने भीतर दोहराते हैं, वही हमारे जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करते हैं। गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि विश्व योग दिवस पर गुणायतन परिसर स्थित श्री सम्मेद शिखर तीर्थराज में मुनिश्री के मुखारविंद से तीन बार ओंकार ध्वनि के साथ भावनायोग का शुभारंभ हुआ इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित संपूर्ण संघ उपस्थित था "भावनायोग" के पूर्व मुनि श्री ने वैज्ञानिक पक्ष को स्पष्ट करते हुए बताया कि मस्तिष्क में स्थित एमिग्डाला (Amygdala) भावनाओं, प्रतिक्रियाओं और संस्कारों से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र है।जब यह अत्यधिक सक्रिय हो जाता है तो क्रोध, भय, तनाव और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाएँ बढ़ने लगती हैं। भावनायोग के नियमित अभ्यास से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है, जो विवेक, निर्णय क्षमता और आत्मनियंत्रण का केंद्र माना जाता है। यह जाग्रत विवेक एमिग्डाला की अनियंत्रित प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण स्थापित करता है।उन्होंने कहा कि भावनायोग का प्रभाव हिपोकैंपस (Hippocampus) पर भी पड़ता है, जो स्मृतियों और अनुभवों के संचयन से संबंधित है। सकारात्मक भावनाओं और सतत चिंतन के अभ्यास से स्मृतियों, धारणाओं और जीवन-दृष्टि में परिवर्तन आने लगता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसका दृष्टिकोण और संपूर्ण जीवन-स्वरूप रूपांतरित हो जाता है।अंत में मुनिश्री ने कहा कि भावनायोग केवल एक साधना नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने का विज्ञान है। सकारात्मक भावों का निरंतर चिंतन व्यक्तित्व को निखारता है, मन को प्रसन्न बनाता है और जीवन को नई दिशा प्रदान करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भावनायोग को अपनाकर उसे अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। इस अवसर पर "मंगल मंगल होते जगत में सब मंगल मय होय"सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए गए

लेखक के बारे में

शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

0 फॉलोअर्स