"धर्म का वास्तविक फल है, सद्बुद्धि, शांति और विनम्रता" — मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज

विदिशा से शोभित जैन की रिपोर्ट

। श्री महावीर जिनालय, किरी मोहल्ला में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को केवल परंपरा के कारण धर्म का पालन नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके उद्देश्य और महत्व को भी समझना चाहिए। मंदिर जाना मात्र एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन,आत्मजागरण और जीवन-परिष्कार का माध्यम है।मुनिश्री ने कहा कि अधिकांश लोग बचपन से अपने परिवार को देखकर मंदिर जाते हैं। दादा-दादी, माता-पिता मंदिर जाते हैं, इसलिए बच्चे भी जाने लगते हैं। यह अच्छी बात है कि धार्मिक संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते रहें, किंतु इसके साथ यह समझना भी आवश्यक है कि मंदिर क्यों जाना है और वहाँ जाकर क्या करना है।
उन्होंने कहा कि मंदिर कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ केवल कुछ माँगने के लिए जाया जाए। भगवान न किसी को पक्षपात से कुछ देते हैं और न किसी से कुछ लेते हैं। भगवान की प्रतिमा के समक्ष जाकर व्यक्ति को अपने भीतर झाँकना चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि उसके जीवन में कौन-सी कमियाँ हैं, किन दोषों को दूर करना है तथा किन गुणों को अपनाना है।मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को यह भी विचार करना चाहिए कि उसका जन्म किस परिवार, किस वातावरण और किन परिस्थितियों में हुआ है। एक ही समय में अनेक बच्चों का जन्म होता है, परंतु सभी के जीवन, संस्कार, अवसर और परिस्थितियाँ समान नहीं होतीं। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि पूर्व में अर्जित धर्म और पुण्य का प्रभाव है। यदि देखने की दृष्टि हो तो धर्म का फल जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देता है।उन्होंने अपने बचपन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि प्रारंभिक अवस्था में बच्चों को मंदिर और पूजा का महत्व पूरी तरह समझ में नहीं आता। माता-पिता के कहने पर वे मंदिर जाते हैं, लेकिन यही छोटे-छोटे संस्कार आगे चलकर उनके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। जैसे पहले अक्षर ज्ञान कराया जाता है और बाद में उसका महत्व समझ में आता है, उसी प्रकार धार्मिक संस्कार भी धीरे-धीरे जीवन में गहराई से उतरते हैं।मुनिश्री ने कहा कि जब बालक बड़ा होता है तो उसके मन में प्रश्न उठता है कि मंदिर क्यों जाना है, पूजा क्यों करनी है और धर्म का महत्व क्या है। तब उसे अनुभव होता है कि बचपन में मिले धार्मिक संस्कार ही उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। यही संस्कार उसे सद्मार्ग पर चलने, अच्छे विचार अपनाने और जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देते हैं।धर्म के वास्तविक फल पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि धर्म केवल बाहरी वैभव या भौतिक सुख प्रदान करने वाला साधन नहीं है। धर्म मनुष्य को सद्बुद्धि, शांति, संतोष, संयम और आत्मिक उन्नति प्रदान करता है। इसलिए मंदिर जाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला संस्कार है।
अहंकार और विनय के विषय में मुनिश्री ने कहा कि यदि सब कुछ जीव स्वयं करता है तो भगवान, गुरु और बड़ों की पूजा-आराधना क्यों की जाए? इसका उत्तर एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा में 96 प्रतिशत अंक प्राप्त करता है तो वह अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहता है कि यह सब गुरुजनों के आशीर्वाद का फल है। जबकि परीक्षा उसने स्वयं दी होती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि उसके भीतर विनय और कृतज्ञता का भाव बना रहे।
उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति, गुरु की आराधना और बड़ों का सम्मान इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य अहंकार से बचा रहे। जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का सम्पूर्ण श्रेय केवल स्वयं को देने लगता है, तब अहंकार जन्म लेता है और वही पतन का कारण बनता है। रावण अत्यंत विद्वान, शक्तिशाली और पराक्रमी था, किंतु उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना।मुनिश्री ने कहा कि आराधना का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि स्वयं को विनम्र, कृतज्ञ और अहंकाररहित बनाना है। जीवन में सफलता के साथ विनय, श्रद्धा और नम्रता का भाव बनाए रखना ही सच्ची साधना है। पुण्य संसार का कारण भी बनता है और उसी पुण्य प्रकृति के प्रभाव से तीर्थंकर भगवानों का जन्म भी होता है।इस अवसर पर मुनि श्री उद्यम सागर महाराज, मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज एवं मुनि श्री हीरक सागर महाराज ससंघ श्री महावीर जिनालय, किरी मोहल्ला स्थित जैन भवन में विराजमान हैं। यह जानकारी अविनाश जैन विद्यावाणी ने देते हुए बताया कि मुनि संघ के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8:15 बजे से आयोजित हो रहे हैं।

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शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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