पुष्पगिरी (सोनकच्छ/छत्रपति संभाजीनगर)परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्नसागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री 108 पीयूषसागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए पुष्पगिरी तीर्थ पर विराजमान हैं।
पूज्य संतों के मंगल सान्निध्य में तीर्थ क्षेत्र पर प्रतिदिन विविध धार्मिक, आध्यात्मिक एवं संस्कारवर्धक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है।इसी क्रम में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्नसागरजी महाराज ने नशामुक्त जीवन, पारिवारिक संस्कारों एवं नैतिक मूल्यों पर प्रभावशाली उद्बोधन देते हुए समाज को व्यसनों से दूर रहने का संदेश दिया।आचार्य श्री ने कहा कि "इतने कमजोर भी मत बनो कि नशा आपका जीना हराम कर दे, बल्कि इतने मजबूत बनो कि नशा कभी आपकी कमजोरी ही न बन पाए।" उन्होंने कहा कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके आत्मसंयम, संस्कार और सदाचार में निहित है।अपने प्रवचन में आचार्य श्री ने एक प्रेरक दृष्टांत सुनाते हुए बताया कि एक व्यक्ति लंबे समय से सर्दी-जुकाम से परेशान था।
अनेक उपचारों के बाद भी लाभ नहीं मिलने पर उसने अपने एक ज़मींदार मित्र से सलाह ली। मित्र ने व्यंग्य करते हुए कहा कि प्रतिदिन दो घूंट शराब पी लिया करो, जुकाम ठीक हो जाएगा।
जब उसने आश्चर्य व्यक्त किया तो ज़मींदार ने मुस्कराते हुए कहा, "शराब ने मेरी ठकुराई और ज़मींदारी तक छीन ली, तो तुम्हारा छोटा-सा जुकाम भी ले जाएगी।" इस दृष्टांत के माध्यम से आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि नशा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि स्वयं सबसे बड़ी समस्या है।उन्होंने कहा कि संसार में जितने लोग समुद्र, नदी और सागर में डूबकर नहीं मरे, उससे कहीं अधिक लोगों का जीवन शराब और अन्य नशीले पदार्थों ने बर्बाद किया है।
व्यसन केवल व्यक्ति का स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि परिवार की खुशियां, आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी नष्ट कर देता है।आचार्य श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि यदि वे अपने माता-पिता, परिवार, बच्चों और अपने जीवन से सच्चा प्रेम करते हैं तो स्वयं भी नशे से दूर रहें तथा अपने परिवार और समाज को भी व्यसनमुक्त बनाने का संकल्प लें।उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने हमें संस्कार, सम्मान और प्रतिष्ठा की जो अमूल्य विरासत सौंपी है, उसकी रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
यदि वर्तमान पीढ़ी अपने कर्तव्यों के प्रति सजग नहीं रही तो आने वाली पीढ़ियां उसे कभी क्षमा नहीं करेंगी।अपने उद्बोधन के अंत में आचार्य श्री ने सभी श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करने का आग्रह करते हुए कहा कि "जो नाम, सम्मान और संस्कार हमें अपने बुजुर्गों से विरासत में मिले हैं, क्या हम उन्हें उसी गरिमा के साथ अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपने के लिए तैयार हैं?"कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे तथा सभी ने नशामुक्त, संस्कारयुक्त एवं संयममय जीवन जीने का संकल्प लिया।प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद ने उक्त जानकारी प्रदान की।