भक्तों की सेवा भी भगवान की पूजा, श्रद्धा में विवेक जरूरी : मुनि श्री प्रमाणसागर

गिरीडीह (श्री सम्मेद शिखर जी): मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि श्रद्धा जीवन का आधार है, लेकिन जब श्रद्धा सत्य ज्ञान और विवेक से दूर होकर केवल मान्यता पर टिक जाती है, तो वह अंधश्रद्धा बन जाती है। इसलिए जीवन में न अश्रद्धा हो और न अंधश्रद्धा, बल्कि ऐसी अटल श्रद्धा हो जो विवेक के साथ धर्म का मार्ग दिखाए। मुनि श्री ने यह बात जबलपुर, मध्यप्रदेश से आई स्पेशल ट्रेन के माध्यम से पहुंचे लगभग 1500 श्रद्धालुओं और देशभर से आए अन्य भक्तों के समक्ष कही। इस दौरान उन्होंने धर्म, परंपरा, आधुनिक जीवन, सेवा, पूजा और सामाजिक जीवन से जुड़े प्रश्नों का सहज, तार्किक और व्यावहारिक समाधान दिया।

मोबाइल के बढ़ते उपयोग पर मुनि श्री ने कहा कि यदि मोबाइल में जिनवाणी, धार्मिक साहित्य या ज्ञान की सामग्री है, तो उसे केवल सामान्य उपकरण न समझें। इसकी पवित्रता और मर्यादा का ध्यान रखें। अशुद्ध स्थानों पर मोबाइल का उपयोग न करें और इसे असावधानी से न रखें। उन्होंने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक होता है जब उसके साथ विनय जुड़ी हो। सुविधा के नाम पर धार्मिक सामग्री और सामान्य उपयोग की चीजों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं है।

धार्मिक संबोधनों के संबंध में मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि जैन परंपरा में निर्धारित संबोधन का ही प्रयोग करना चाहिए। मुनि महाराज के लिए ‘नमोस्तु’, आर्यिका माताजी के लिए ‘वंदामि’ तथा ऐलक-क्षुल्लक के लिए ‘इच्छामी’ कहा जाता है। उन्होंने कहा कि शब्दों के अर्थ भले ही निकट हों, लेकिन संबोधन में विनय और परंपरा का अपना अनुशासन है। जैन धर्म में चतुर्विध संघ—मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका—की परंपरा रही है। सच्चा श्रावक वही है जिसमें श्रद्धा, विवेक और कर्तव्यनिष्ठा हो।

श्रीफल चढ़ाने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि देवता और गुरु के दर्शन कभी खाली हाथ नहीं करने चाहिए। कुछ समर्पित करना श्रद्धा का प्रतीक है, और श्रीफल जीवन को सफल बनाने की भावना को दर्शाता है। पत्थर की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि पत्थर तराशकर भगवान बनता है, इसलिए जीवन में पत्थर जैसी दृढ़ता रखें, लेकिन पत्थर-दिल न बनें। अपने भीतर शुद्धता रखें, पर दूसरों की संवेदनाओं के प्रति कठोर न हों।

मृत परिजनों की तस्वीर घर में रखने से नकारात्मकता आने संबंधी सवाल पर मुनि श्री ने कहा कि पूर्वजों की तस्वीर रखना गलत नहीं है। उन्हें पूजने के बजाय आदर्श के रूप में रखा जा सकता है। तस्वीर देखकर व्यक्ति को अपने वंश की परंपरा और पूर्वजों द्वारा छोड़े गए संस्कारों का स्मरण होता है। उन्होंने ऐसी तस्वीरों से नकारात्मकता फैलने की धारणा को उचित नहीं माना। वहीं, भावनायोग के माध्यम से मानसिक तनाव और अवसाद से जूझ रहे लोगों की सहायता कर रही कार्यकर्ता को उन्होंने इस कार्य के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने की प्रेरणा दी।

सेवा के महत्व पर मुनि श्री ने कहा कि जो लोग तीर्थ पर आकर पूजा-पाठ नहीं कर पाते, यदि वे भक्तों की सेवा में लगे हैं, तो उनकी सेवा भी भगवान की पूजा के समान है। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भक्तों की सेवा में व्यस्त रहने के कारण पूजा नहीं कर पाया, तो उसे अपराधबोध नहीं होना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि गुरु को केवल तीर्थ या आयोजन स्थल पर छोड़कर न जाएं, बल्कि उनके संदेश और संस्कारों को अपने हृदय में बसाएं।

शंका समाधान के बाद जबलपुर जैन युवा महासंघ के सदस्यों ने गुणायतन से जुड़े पदाधिकारियों और सेवा कार्यकर्ताओं का जबलपुर जैन समाज की ओर से उनकी सेवाओं के लिए आभार व्यक्त किया। प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्या वाणी' ने बताया कि मुनि श्री के शंका समाधान का मूल संदेश यही रहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। ज्ञान के साथ विनय, श्रद्धा के साथ विवेक, पूजा के साथ सेवा और गुरु के संदेश को जीवन में उतारना ही धर्म को सार्थक बनाता है।

भक्तों की सेवा भी भगवान की पूजा, श्रद्धा में विवेक जरूरी : मुनि श्री प्रमाणसागर - मध्य प्रदेश - LALITPUR LIVE TV
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शोभित जैन

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विदिशा REPORTER

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