संयम के बिना चारों गतियों में दुख, सम्यग्दर्शन से खुलता है आत्मकल्याण का मार्ग

विदिशा: संयम और सम्यग्दर्शन से ही संभव है आत्मकल्याण, मुनि श्री निर्णय सागर महाराज के संघस्थ क्षुल्लक श्री तत्वसागर जी महाराज का प्रवचन

विदिशा में मुनि श्री निर्णय सागर महाराज के संघस्थ क्षुल्लक श्री तत्वसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन के दौरान संयम, सम्यग्दर्शन और आत्मकल्याण के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं जुटाना ही नहीं, बल्कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करना है।

महाराज श्री ने स्पष्ट किया कि संयम के अभाव में जीव चारों गतियों में दुखों का अनुभव करता है। उन्होंने कविता के माध्यम से जीवन की वास्तविकता को रेखांकित करते हुए कहा— “संयम बिन चारों गति दुखी, कह सकता न कहानी। जन्म-मृत्यु चतुर्गति समाप्त कर, आप्त बनो केवल ज्ञानी।”

प्रवचन के दौरान उन्होंने बताया कि कर्मों के प्रभाव से जीव मनुष्य, तिर्यंच, देव और नरक गति में जन्म लेता है। पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जबकि पाप कर्म दुखद परिस्थितियों का कारण बनते हैं। इसलिए जीव को अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने प्रेम, क्षमा और हृदय परिवर्तन का संदेश देते हुए कहा कि दूसरों के प्रति द्वेष रखने के बजाय अपने भीतर सद्भाव विकसित करना आवश्यक है। दृष्टिकोण बदलने से परिस्थितियों को समझने का तरीका बदलता है, लेकिन हृदय परिवर्तन से ही संबंधों में वास्तविक मधुरता आती है।

जैन दर्शन के महत्वपूर्ण सिद्धांत 'सम्यग्दर्शन' की व्याख्या करते हुए महाराज श्री ने बताया कि इसकी उत्पत्ति में उपादान और निमित्त कारण की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जो स्वयं कार्यरूप में परिणमन करता है, वह उपादान कारण है, जबकि कार्य की सिद्धि में सहायक बनने वाला कारण निमित्त कहलाता है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए आत्मा की आंतरिक योग्यता उपादान है, जबकि अंतरंग निमित्त के रूप में कर्मों की अनुकूल अवस्था तथा बाह्य निमित्त के रूप में सद्गुरु, जिनवाणी और धर्मोपदेश सहायक होते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल बाहरी निमित्त मिलने से ही सम्यग्दर्शन की प्राप्ति निश्चित नहीं होती, इसके लिए आत्मा की पात्रता और अंतरंग कारणों का अनुकूल होना अनिवार्य है। सद्गुरु का सान्निध्य, धर्म का श्रवण और जिनेंद्र भगवान के स्वरूप का दर्शन जीव को सही दिशा प्रदान करते हैं, लेकिन आत्मा में सम्यक श्रद्धा का जागरण भी आवश्यक है।

सम्यग्दर्शन के भेदों पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि उत्पत्ति की अपेक्षा इसके दो प्रमुख भेद हैं— निसर्गज और अधिगमज। पूर्व संस्कारों के प्रभाव से परोपदेश के बिना उत्पन्न होने वाला सम्यग्दर्शन निसर्गज है, जबकि गुरु अथवा शास्त्र के उपदेश से उत्पन्न होने वाला सम्यग्दर्शन अधिगमज कहलाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने उपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन की अवधारणाओं को भी समझाया। उन्होंने कहा कि निश्चय सम्यग्दर्शन आत्मा के वास्तविक स्वरूप और सच्चे देव, शास्त्र तथा गुरु के प्रति यथार्थ श्रद्धा से संबंधित है, जबकि व्यवहार सम्यग्दर्शन में श्रद्धा के अनुरूप आचरण और दोषों से बचने पर बल दिया जाता है।

अंत में महाराज श्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन केवल शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्य को पहचानकर उसके प्रति दृढ़ श्रद्धा रखना और जीवन में उसके अनुरूप परिवर्तन लाना है। जब व्यक्ति अपने भीतर क्षमा, करुणा, अनुकंपा और वैराग्य जैसे गुणों को विकसित करता है, तब उसका जीवन आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ता है। प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्या वाणी' ने बताया कि प्रवचन का मूल संदेश यही रहा कि मनुष्य को अपने जीवन में संयम, सदाचार और सम्यक श्रद्धा को स्थान देना चाहिए। बाहरी परिस्थितियों को बदलने से पहले स्वयं के भीतर परिवर्तन लाना ही आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है।

लेखक के बारे में

शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

0 फॉलोअर्स