विदिशा के इंद्रप्रस्थ स्थित श्री वासुपूज्य जिनालय में मुनि श्री निर्णय सागर महाराज के सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्या वाणी’ ने बताया कि मुनि श्री अपने प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मस्वरूप की पहचान, संयम, सम्यक दर्शन और धर्म के सही उपयोग की प्रेरणा दे रहे हैं।
मुनि श्री ने कहा कि केवल जैन कुल में जन्म लेना या धर्म का मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि धर्म के मर्म को समझकर उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यक्ति से तत्काल मुनि या आर्यिका बनने की अपेक्षा नहीं है, लेकिन जीवन में जीवों की हिंसा से बचने की भावना का होना अनिवार्य है। यदि पूर्ण संयम संभव न हो, तो व्यक्ति को देशव्रत की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और यदि वह भी संभव न हो, तो कम से कम सम्यक दर्शन की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए धर्म को केवल सुनने तक सीमित न रखें। जीवन में थोड़ा संतोष, आरंभ-परिग्रह का त्याग और भीतर शुद्ध भाव पैदा करने का प्रयास ही जीवन को सही दिशा दे सकता है।
सम्यक दर्शन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि इसके अंतरंग और बहिरंग कारणों को समझना जरूरी है। उन्होंने आगाह किया कि शास्त्र का अध्ययन और सही समझ न होने पर कोई भी व्यक्ति भ्रमित कर सकता है। आज के दौर में टीवी और मोबाइल पर तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती हैं, इसलिए अपने विवेक और शास्त्र ज्ञान को मजबूत करना आवश्यक है।
जिनबिंब के दर्शन और पूजा को लेकर फैलाई जाने वाली भ्रांतियों पर मुनि श्री ने कहा कि जिन प्रतिमा के दर्शन से सम्यक दर्शन की भावना जागृत होती है और यह मिथ्यात्व आदि कर्मों के उपशम में निमित्त बनता है। उन्होंने इसे विरोधाभास बताते हुए कहा कि एक ओर जिनेंद्र भगवान के प्रति श्रद्धा रखना और दूसरी ओर जिनबिंब के दर्शन को मिथ्यात्व बताने वाली बातों को स्वीकार करना उचित नहीं है। उन्होंने श्रद्धालुओं को ऐसी भ्रामक बातों से सावधान रहने की सलाह दी।
मुनि श्री ने जिनबिंब और वेदी निर्माण से जुड़ा एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि एक स्थान पर वेदी निर्माण में आ रही बाधाओं को शास्त्रीय विधि से दूर किया गया। इस दौरान उन्होंने निर्माण कार्य में लगे एक मुस्लिम कारीगर को प्रेरित किया कि वह इसे केवल मजदूरी न समझकर श्रद्धा और पवित्रता से करे। मुनि श्री के मार्गदर्शन का प्रभाव यह हुआ कि कारीगर ने निर्माण कार्य पूरा होने तक मांसाहार न करने का संकल्प लिया और बाद में आजीवन मांस त्याग का निर्णय लिया। उन्होंने सिलवानी का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां जिनालय निर्माण के दौरान एक श्रद्धालु ने अपनी इच्छा पूरी न होने के बावजूद गुरु के प्रति समर्पण भाव से बड़ी राशि अर्पित की और आजीवन नियमित पूजन का संकल्प लिया।
मुनि श्री ने कहा कि धर्म की सार्थकता विचार और आचरण में है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि व्यापार और परिवार के साथ-साथ धर्म के लिए भी समय निकालें। इसी उद्देश्य से विदिशा में पुरुष पाठशाला प्रारंभ की जा रही है, जहां प्रातः 8:30 बजे से अध्ययन कार्य होगा। उन्होंने कहा कि समय कम हो तो भी शास्त्र अध्ययन की शुरुआत जरूर करें, क्योंकि नियमित अध्ययन ही सही दृष्टि और सम्यक दर्शन की ओर ले जाता है।

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