निन्यानबे के चक्कर में मनुष्य भूल रहा आत्मकल्याण: मुनिश्री निर्णय सागर

विदिशा: आत्मबोध ही वास्तविक जागरण, बाहरी उपलब्धियों के पीछे भागने से दूर होती है शांति

विदिशा स्थित श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का वास्तविक सोना अच्छे गद्दे-तकिए या आरामदायक कमरे के अभाव में नहीं, बल्कि आत्मतत्त्व के संवेदन और आत्मानुभूति के अभाव में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति को अपने आत्मस्वरूप का बोध नहीं है, वह संसार में जागता हुआ दिखाई देने पर भी आध्यात्मिक रूप से सोया हुआ है। आत्मा को जान लेना और उसका अनुभव कर लेना ही वास्तविक जागरण है।

मुनि श्री ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली और जीवनशैली पर चर्चा करते हुए कहा कि आज संसार में शिक्षा प्राप्त करने की होड़ लगी है। बच्चे और युवा विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और कोचिंग के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं। किसी को कलेक्टर बनना है, तो किसी को डॉक्टर या विदेश जाना है। मुनि श्री ने कहा कि अध्ययन करना गलत नहीं है, लेकिन जीवन में धर्म, परिवार, स्वास्थ्य, खेल और आत्मचिंतन के लिए भी समय निकालना आवश्यक है।

शिक्षा की परिभाषा स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त करना ही शिक्षा नहीं है, बल्कि एक अच्छे इंसान के रूप में जीवन जीने की कला सीखना ही वास्तविक शिक्षा है। उन्होंने कहा कि मनुष्य ने अनेक पुस्तकें पढ़ लीं और डिग्रियां हासिल कर लीं, लेकिन यदि उसे अपने आत्मतत्त्व को जानने की कला नहीं आई, तो उसकी शिक्षा अधूरी है। विद्या केवल ब्लैकबोर्ड, पुस्तक, कॉपी-पेन या डिग्री में नहीं, बल्कि आत्मा में स्थित है। जो अपने आत्मस्वरूप को पहचान लेता है, वही जीवन का सच्चा विद्यार्थी है।

मुनि श्री ने ‘निन्यानबे के चक्कर’ की कथा सुनाते हुए कहा कि एक सेठ के पड़ोस में रहने वाला मोची प्रतिदिन भगवान के भजन करता था। सेठ की पत्नी अक्सर अपने पति को मोची का उदाहरण देकर भजन करने के लिए कहती थी। सेठ ने मोची की परीक्षा लेने के लिए उसकी झोंपड़ी में निन्यानबे रुपये की थैली डाल दी। मोची ने जब थैली देखी तो उसे लगा कि भगवान उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए हैं, लेकिन रुपये गिनने पर उसे केवल निन्यानबे मिले। एक रुपये की कमी उसके मन में ऐसी बैठी कि उसने निश्चय किया कि पहले एक रुपया पूरा करके सौ रुपये करेगा, उसके बाद ही भजन करेगा। धीरे-धीरे वह उस एक रुपये की चिंता में इतना उलझ गया कि उसके भजन बंद हो गए।

मुनि श्री ने कहा कि आज अधिकांश मनुष्यों की स्थिति वैसी ही है। जो मिला है, उसमें संतोष नहीं है और जो नहीं मिला, उसके पीछे पूरा जीवन लगा दिया है। मनुष्य धन, प्रतिष्ठा, व्यापार और भविष्य की चिंता में इतना व्यस्त है कि उसे दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, परिवार और आत्मकल्याण के लिए समय नहीं मिलता। जैसे निन्यानबे रुपये की कमी ने मोची से उसका भजन छीन लिया, उसी प्रकार जीवन की छोटी-छोटी इच्छाएं और अभाव मनुष्य से उसकी शांति, संतोष और धर्म छीन रहे हैं।

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं अशोक गुडडू ने बताया कि मुनि श्री के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, स्टेशन माधवगंज में आयोजित किए जा रहे हैं। मुनि श्री ने अंत में कहा कि वास्तविक जागरण बाहर की दुनिया में अधिक पाने का नाम नहीं, बल्कि भीतर स्थित आत्मा को पहचानने का नाम है। जो आत्मा को जान लेता है, उसके जीवन में संतोष और विवेक आता है, जबकि बाहरी उपलब्धियों में उलझा व्यक्ति सब कुछ पाकर भी भीतर से सोया ही रहता है।

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शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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