जीवन का लक्ष्य आत्मा का कल्याण, परिग्रह का त्याग और समता का अभ्यास है : आर्यिका श्री अपूर्व मति माताजी एवं अनुत्तर मति माताजी

कल्याण अहिरवार चंदेरी मो.7047883182 ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी चंदेरी में चातुर्मास के पावन अवसर पर आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आर्यिका श्री 105 अपूर्व मति माताजी एवं परम पूज्य आर्यिका श्री 105 अनुत्तर मति माताजी ने जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों का सरल एवं प्रेरणादायी विवेचन करते हुए श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, संयम और सदाचार का संदेश दिया।अपने मंगल प्रवचन में आर्यिका श्री अपूर्व मति माताजी ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है।

इसका उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ, धन-संपत्ति या सांसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा पर अनादिकाल से बंधे कर्मों का क्षय करना है।

कर्मों की निर्जरा तभी संभव है, जब मनुष्य धीरे-धीरे अपनी परिणति को अशुभ भावों से हटाकर शुभ भावों, सेवा, स्वाध्याय, संयम, तप, दान और धर्म की ओर अग्रसर करे।माताजी ने कहा कि कोरोना काल की विभीषिका को स्मरण करें।

उस समय धन, पद और प्रतिष्ठा से अधिक जीवन और स्वास्थ्य का महत्व समझ में आया। अनेक परिवारों ने कठिनाइयों, बिछोह और संघर्ष का सामना किया। उस काल ने यह शिक्षा दी कि संसार की सभी वस्तुएँ अनित्य हैं।

इसलिए आज जब परिस्थितियाँ सामान्य हैं, तब हमें समय का सदुपयोग करते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।उन्होंने कहा कि पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज सदैव कहते थे कि परिग्रह जितना कम होगा, जीवन उतना ही हल्का, शांत और आनंदमय बनेगा।

आवश्यकता से अधिक संग्रह मन में भय, मोह और अशांति उत्पन्न करता है, जबकि सीमित आवश्यकताएँ और संतोष आत्मिक सुख प्रदान करते हैं।

समता, सादगी और संयम ही सच्चे धर्म की पहचान हैं।इसके पश्चात आर्यिका श्री अनुत्तर मति माताजी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि मनुष्य का प्रत्येक दिन आत्मनिरीक्षण का अवसर है।

यदि हम प्रतिदिन अपने विचारों, वाणी और व्यवहार की समीक्षा करें तो अनेक दोष स्वतः दूर होने लगते हैं। धर्म का वास्तविक स्वरूप मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।

क्षमा, दया, करुणा, विनय, मैत्री और सहिष्णुता का आचरण ही जैन धर्म की सच्ची साधना है।माताजी ने कहा कि संसार में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान तथा संयोग-वियोग जीवन के स्वाभाविक प्रसंग हैं।

जो व्यक्ति इन सभी परिस्थितियों में समभाव बनाए रखता है, वही वास्तविक साधक है। राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ना ही मोक्ष मार्ग है।

परिग्रह का त्याग, अहिंसा का पालन, संयमित जीवन और सद्भावपूर्ण व्यवहार व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाते हैं।दोनों पूज्य माताजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में परिग्रह को सीमित करें, समय का सदुपयोग करें, धर्म, सेवा और स्वाध्याय को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं तथा अपने बच्चों को भी संस्कार, सदाचार और जैन संस्कृति से जोड़ें।

उन्होंने कहा कि समाज तभी सशक्त बनेगा, जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं के जीवन को संयम, समता और आत्मानुशासन से प्रकाशित करेगा। यही मानव जीवन की सार्थकता है और यही मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है।

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