विदिशा। मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने कहा कि भगवान के वचन और जिनवाणी आत्मा के विकारों को दूर करने वाली अमृतरूपी औषधि हैं। शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों से खीर और दूध के अमृतमय होने की मान्यता है, लेकिन आचार्य भगवंतों ने हमें जिनवाणी के माध्यम से आत्मा को अमृतमय बनाने का मार्ग प्रदान किया है। जिनवाणी का श्रवण तभी सार्थक है, जब उसके संदेश को समझकर जीवन में उतारा जाए। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि विदिशा में आयोजित तीन दिवसीय पाठशाला शिक्षक संगोष्ठी का आज तीसरा दिन था संगोष्ठी में आए सभी शिक्षकों का कमेटी द्वारा सम्मान किया गया उपरोक्त अवसर पर मुनि श्री ने जिनवाणी के महत्व, शिक्षक की भूमिका और धार्मिक संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया। महाराज श्री ने दिगंबर जैन परंपरा में आचार्य कुंदकुंद स्वामी के विशिष्ट योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि आचार्य कुंदकुंद स्वामी हमारी परंपरा की आन-बान और पहचान हैं। उनके ग्रंथों में आत्मकल्याण और आत्मस्वरूप को समझने का गहन मार्गदर्शन मिलता है। जिनवाणी केवल सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा के विकारों को दूर करने का माध्यम है। जिस प्रकार शरीर में विकार उत्पन्न होने पर औषधि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा में संचित विकारों को दूर करने के लिए भगवान के वचनों रूपी औषधि की आवश्यकता है। शरीर की शुद्धि के साथ आत्मा की शुद्धि का प्रयास भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में बच्चों को अनेक विषयों की शिक्षा मिलती है, लेकिन जैन पाठशालाएं उन्हें धर्म का मर्म, नैतिकता, अनुशासन और जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाले संस्कार प्रदान करती हैं। जिनवाणी के अध्ययन से बच्चों में आत्मचिंतन और सदाचार की भावना विकसित होती है। पाठशालाओं में आने वाले बच्चों को ऐसा ज्ञान मिल रहा है, जो उनके जीवन को नई दिशा दे सकता है। इसलिए पाठशालाओं का संचालन और उनमें बच्चों की नियमित सहभागिता समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। मुनि श्री ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि आप केवल शिक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता हैं। आप नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण और समाज के संस्कारों को सुरक्षित रखने का कार्य कर रहे हैं। भगवान महावीर की दिव्यध्वनि और जिनवाणी के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की परंपरा को आगे बढ़ाना हम सभी का दायित्व है। शिक्षकों को अपने समय, श्रम और प्रतिभा का उपयोग पूरी निष्ठा से करना चाहिए, क्योंकि आज बच्चों को दिए गए संस्कार ही कल समाज का स्वरूप निर्धारित करेंगे। महाराज श्री ने कहा कि प्रचलित कहावत है कि दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है, लेकिन यह भी समझना चाहिए कि दाने-दाने पर देने वाले का नाम लिखा है। आहारदान देने वालों का पुण्य महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार ज्ञानदान देने वाले संतों और शिक्षकों का योगदान भी अमूल्य है। उन्होंने विदिशा में धर्मप्रभावना और जिनवाणी के प्रसार के अवसर को पुण्ययोग बताते हुए पाठशालाओं में नियमित रूप से सेवा देने वाले शिक्षकों की सराहना की। उन्होंने संगोष्ठी में तीनों दिन निष्ठापूर्वक शामिल होने वाले प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि वर्षों से पाठशालाओं में शिक्षण करने वाले शिक्षकों का सम्मान होना चाहिए। ऐसे आयोजनों में अनुशासन, समर्पण और निरंतरता आवश्यक है। केवल संगोष्ठी में भाग लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि यहां प्राप्त मार्गदर्शन को व्यवहार में उतारना भी जरूरी है। उन्होंने शिक्षकों के ज्ञान और समझ का आकलन करने के लिए परीक्षा आयोजित करने की आवश्यकता बताई तथा नकल से दूर रहकर अपनी बुद्धि और विवेक के आधार पर प्रदर्शन करने की प्रेरणा दी। प्रतियोगिता का उद्देश्य किसी एक को आगे करना नहीं, बल्कि सभी को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करना है। महाराज श्री ने कहा कि साधु-संत त्याग और साधना से समाज को प्रेरणा देते हैं। गृहस्थों को भी केवल साधुओं की आहार सेवा तक सीमित न रहकर उनके आदर्शों से सीखना चाहिए। जिनवाणी का वास्तविक लाभ तभी है, जब उसका प्रभाव हमारे विचारों और व्यवहार में दिखाई दे। तीन दिवसीय संगोष्ठी की सफलता इसी में है कि शिक्षक यहां से नई ऊर्जा लेकर लौटें और पाठशालाओं के माध्यम से बच्चों में धर्म, संस्कार और आत्मकल्याण की भावना को निरंतर विकसित करें।



📸 और तस्वीरें