आखिर किसके दबाव में हुआ फैसला? सांदीपनि विद्यालय छोड़ 22 किमी दूर के शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य बनाने पर उठे गंभीर सवाल

विद्यालय में आठ योग्य उच्च माध्यमिक शिक्षक मौजूद, फिर भी मायापुर से बुलाए गए शिक्षक को सौंपी जिम्मेदारी; नियमित प्राचार्य बोले—"मेरे लौटने तक मेरा चेंबर नहीं खोला जाए"</strong>

खनियाधाना। खनियाधाना के सांदीपनि विद्यालय में प्रभारी प्राचार्य की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विद्यालय के नियमित प्राचार्य टेकचंद जैन अस्वस्थ होने के कारण उपचाररत हैं। उनका कहना है कि उन्होंने केवल अपनी मेडिकल स्थिति की जानकारी विभागीय अधिकारियों को दी है। उन्होंने न तो किसी को प्रभार सौंपा है और न ही वे कार्यमुक्त हुए हैं। इसके बावजूद विद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर 22 किलोमीटर दूर स्थित मायापुर विद्यालय के उच्च माध्यमिक शिक्षक बुंदेल सिंह अहिरवार को प्रभारी प्राचार्य का दायित्व दिए जाने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सांदीपनि विद्यालय में ही आठ उच्च माध्यमिक शिक्षक, जो विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण कर पदस्थ हैं, मौजूद हैं तो आखिर उन्हें नजरअंदाज कर दूसरे विद्यालय के शिक्षक को प्रभारी बनाने की क्या आवश्यकता थी? क्या स्थानीय शिक्षकों पर विभाग को भरोसा नहीं था, या फिर इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण है? इस निर्णय को लेकर शिक्षा जगत में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

प्राचार्य टेकचंद जैन ने फोन पर बताया कि उनके कार्यालय कक्ष में विद्यालय से जुड़े कई महत्वपूर्ण एवं गोपनीय शासकीय दस्तावेज, अभिलेख तथा रिकॉर्ड सुरक्षित रखे हुए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक वे स्वयं स्वास्थ्य लाभ लेकर वापस नहीं लौटते, तब तक उनके चेंबर को नहीं खोला जाना चाहिए। उनका कहना है कि वे स्वयं नियमानुसार प्रभार सौंपेंगे।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि उनकी अनुपस्थिति में उनके चेंबर का ताला खोला जाता है और किसी प्रकार के दस्तावेजों की क्षति, गुम होने या चोरी जैसी घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इस संबंध में अभी तक विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सांदीपनि विद्यालय का पिछले तीन वर्षों से बोर्ड परीक्षा परिणाम 90 प्रतिशत से अधिक रहा है। ऐसे में विद्यालय के नियमित शिक्षकों को जिम्मेदारी देने के बजाय दूरस्थ विद्यालय के शिक्षक को अतिरिक्त प्रभार सौंपने से प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य प्रभावित होने की आशंका है। एक प्रभारी को दो विद्यालयों के बीच लगातार आवागमन करना पड़ेगा, जिसका असर दोनों संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है।

अब पूरे मामले में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी विनोद पाठक की भूमिका भी चर्चा का विषय बन गई है। लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी क्या प्रशासनिक मजबूरी थी कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध योग्य शिक्षकों की अनदेखी कर मायापुर से शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य बनाया गया? क्या इस निर्णय के लिए कोई विशेष आदेश, नियम या औचित्य है? यदि है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

शिक्षा विभाग के जानकारों का कहना है कि प्रभारी प्राचार्य की नियुक्ति प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर की जा सकती है, लेकिन ऐसे निर्णयों में पारदर्शिता और औचित्य भी उतना ही आवश्यक होता है। यदि नियमित प्राचार्य मेडिकल अवकाश पर हैं और उन्होंने अभी तक विधिवत प्रभार नहीं सौंपा है, तो उनके कार्यालय कक्ष एवं उसमें रखे अभिलेखों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी विभाग की जिम्मेदारी है।

अब अभिभावकों, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों की मांग है कि जिला शिक्षा अधिकारी और लोक शिक्षण संचालनालय इस पूरे मामले की समीक्षा करें तथा स्पष्ट करें कि 22 किलोमीटर दूर के शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी, जबकि उसी विद्यालय में योग्य एवं वरिष्ठ शिक्षक उपलब्ध थे। साथ ही, प्राचार्य के कार्यालय में रखे महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

लेखक के बारे में

ATUL JAIN

@atuljain

Senior Reporter Shivpuri

1000 फॉलोअर्स