पुष्पगिरी तीर्थ में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज का प्रवचन, जीवन में समर्पण के महत्व पर दिया संदेश
औरंगाबाद के पुष्पगिरी, सोनकच्छ में परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज के सानिध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके सानिध्य में वहां निरंतर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं।
इसी श्रृंखला में आज उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि किसी को जलाकर खुश होना अलग बात है, लेकिन इन्होंने खुद जलकर रोशनी दी थी। उन्होंने कहा कि जीवन समर्पण मांगता है। भारतीय संस्कृति अपहरण की नहीं, अपितु समर्पण की संस्कृति है। यदि आप एक बार अपने इष्ट-आराध्य के प्रति समर्पित हो जाएं, तो प्रभु आप पर बलिहारी हो जाएंगे।
आचार्य श्री ने तीर्थों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारे अधिकतर तीर्थ गंगा और नदियों के किनारे स्थित हैं। उन्होंने प्रश्न किया कि ये किस बात के प्रतीक हैं? उन्होंने बताया कि ये इस बात के प्रतीक हैं कि नदियां सागर की तरफ जा रही हैं, नदियां मिटने के लिए जा रही हैं। तीर्थ वहीं है जहां आपको मिटने का बोध मिले। तीर्थ हमसे कह रहे हैं कि यहां आकर आप भी मिट जाएं और अपने अहंकार को मिटा डालें।
उन्होंने आगे कहा कि नदी कहती है कि मैं सागर में जाकर मिटूंगी, तुम यहां आकर मिट जाओ। बस, मैं गंगासागर बन जाऊंगी और तुम परमात्मा में समा जाओगे। तुम परमात्मा ही बन जाओगे क्योंकि बूंद मिटती है तो सागर बन जाती है और माटी पिटती है तो गागर बन जाती है। इसलिए मिटना और पिटना बुरा नहीं है।
आचार्य श्री ने अपनी बात को इन पंक्तियों के माध्यम से सारगर्भित किया: "ज़रा अदब से उठाना इन बुझे दियों को, इन्होंने कल रात सबको रोशनी दी थी।"
इस जानकारी की पुष्टि प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा और पियूष कासलीवाल, औरंगाबाद ने की है।


📸 और तस्वीरें