गिरिडीह (श्री सम्मेद शिखर) से शोभित जैन की रिपोर्ट:
सम्मेद शिखरजी में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने 'व्यवहार शुद्धि' पर आधारित प्रेरक प्रवचन दिए। मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन भाव, विचार, भाषा और व्यवहार की शुद्धि से ही सिद्धि की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मोक्षमार्ग में भाव, विचार और भाषा की शुद्धि के बाद व्यवहार की शुद्धि का सबसे महत्वपूर्ण आधार विनम्रता है। विनम्रता केवल औपचारिक सम्मान या चरण स्पर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति के अस्तित्व, भावनाओं और गरिमा का सम्मान करने का नाम है।
मुनिश्री ने कहा कि वास्तविक विनय छोटे-बड़े के भेद से परे हर व्यक्ति के प्रति सम्मानपूर्ण दृष्टि रखने में है। बड़ों के प्रति विनय का अर्थ उनका आदर-सम्मान करना है, जबकि छोटों के प्रति विनय का अर्थ उनका स्नेहपूर्वक ध्यान रखना है। हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति कभी खुद को छोटा या उपेक्षित महसूस न करे। यही सच्चे बड़प्पन की असली पहचान है।
आज परिवारों में पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि इसका सबसे बड़ा कारण व्यवहार की कठोरता और संस्कारों का क्षरण है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता के आचरण में देखते हैं। यदि बड़े स्वयं अपने माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का सम्मान करेंगे, तो यही संस्कार अगली पीढ़ी में सहज रूप से स्थानांतरित होंगे। बच्चे वह नहीं करते जो आप उन्हें करने को कहते हैं, बल्कि वे वही दोहराते हैं जो आप स्वयं करते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि केवल चरण स्पर्श कर लेना ही सच्ची विनय नहीं है। यदि पैर छूने के बाद भी बड़ों की बात बीच में काटी जाए या उनके प्रति असम्मानजनक व्यवहार किया जाए, तो वह केवल एक औपचारिकता और अभिनय मात्र है। असहमति को भी संयम, शालीनता और सम्मान के साथ व्यक्त किया जाना चाहिए। जैन परंपरा के 'तथाकार' भाव का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि पहले सामने वाले की बात को स्वीकार करें, फिर विनम्रता के साथ अपना पक्ष रखें। इससे संवाद सार्थक होता है और संबंधों में मधुरता बनी रहती है।
मुनिश्री ने कहा कि बड़ों को भी केवल इसलिए किसी उचित सुझाव को खारिज नहीं करना चाहिए कि वह किसी छोटे ने दिया है। एक विनम्र व्यक्ति की दृष्टि 'मेरा सो खरा' (जो मेरा है वही सही है) पर नहीं, बल्कि 'खरा सो मेरा' (जो सही है वही मेरा है) पर टिकी होती है। अहंकार मनुष्य को न तो अपनी भूल स्वीकार करने देता है और न ही दूसरों के गुणों को अपनाने देता है, जबकि विनम्र व्यक्ति अपनी त्रुटि स्वीकार करने और दूसरों की अच्छाइयों को ग्रहण करने में कभी संकोच नहीं करता।
सहनशीलता को एक सशक्त व्यक्तित्व का आधार बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि जो व्यक्ति जितना अधिक सहन करना सीखता है, वह उतना ही अधिक आत्मबल और सामर्थ्य अर्जित करता है। उन्होंने विनम्रता को व्यावहारिक जीवन में उतारने के चार मुख्य सूत्र बताए—पहला अहंकार का त्याग, दूसरा सभी के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार, तीसरा दूसरों के अच्छे कार्यों का श्रेय उन्हें देना, और चौथा अपनी गलती स्वीकार कर आवश्यकता पड़ने पर क्षमा मांगने का साहस रखना। यही गुण इंसान के व्यक्तित्व को प्रभावशाली और संबंधों को प्रगाढ़ बनाते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे प्रतिदिन स्वयं से यह संकल्प लें—"मुझे विनम्र रहना है।" जहाँ भी अहंकार का भाव जागे, वहाँ आत्मचिंतन और प्रतिक्रमण करें तथा विनम्र व संस्कारित लोगों की संगति अपनाएँ। इससे व्यवहार की शुद्धि के साथ-साथ आत्मिक विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा। आज व्यक्तित्व विकास (पर्सनैलिटी डेवलपमेंट) के लिए कई तरह के प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, जबकि हमारे धर्मशास्त्र और गुरुजन सदियों पहले ही जीवन को सफल बनाने के ये सरल सूत्र दे चुके हैं। प्रवचन केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए होते हैं। जब धर्म मस्तिष्क से उतरकर हृदय में स्थान बना लेता है, तभी जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है।
गुणायतन एवं सेवायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने जानकारी देते हुए बताया कि आज मुनि श्री समादर सागर महाराज ने केशलोँच कर सभी श्रद्धालुओं को वैराग्य, समता और आत्मबल का संदेश दिया। इस पावन धर्मसभा में मुनि श्री संधान सागर महाराज, मुनि श्री सार सागर महाराज एवं मुनि श्री रूप सागर महाराज भी सानिध्य प्रदान कर रहे थे। कार्यक्रम का कुशल संचालन बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया द्वारा किया गया।




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