हम केवल गुरुदेव का गुणगान ही न करें, बल्कि उनकी आज्ञा का पालन करें" : मुनि श्री उद्यमसागर महाराज

विदिशा से शोभित जैन की रिपोर्ट

। संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का 59वाँ दीक्षा दिवस श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में मुनि श्री उद्यमसागर महाराज, मुनि श्री गरिष्ठसागर महाराज एवं मुनि श्री हीरकसागर महाराज के सान्निध्य में श्रद्धापूर्वक मनाया गया। यह जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने देते हुये बताया
प्रातःकालीन बेला में भगवान का अभिषेक, नित्य-नियम पूजन तथा आचार्य छत्तीसी विधान सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर अनेक श्रावकों ने नए नियम ग्रहण कर आचार्य गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए संयम-पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री उद्यमसागर महाराज ने कहा कि गुरुदेव दीक्षा के समय एक बात विशेष रूप से कहा करते थे—"पंच परमेष्ठी को सदैव स्मरण रखना।" उन्होंने कहा कि आचार्य श्री ने हमारे जीवन में केवल पंच परमेष्ठी की स्थापना ही नहीं की, बल्कि हमें पंच परमेष्ठी में स्थान दिला दिया उनके इस महान उपकार को हम जीवनभर नहीं भूल सकते। जब तक यह उपकार स्मरण मेंरहेगा, हमारा जीवन सही दिशा में चलता रहेगा।मुनि श्री ने कहा कि जितनी देर आत्मा का स्मरण रहता है,उतनी देर हमारे भाव निर्मल बने रहते हैं और कर्मों का बंधन भी बदलने लगता है।
गुरु हमें दीक्षा दे सकते हैं, किंतु साधना स्वयं करनी होती है।
गुरु मार्ग दिखाते हैं,उस पर चलना शिष्य को खुद पढता है। उन्होंने जो देना था, वह सब दे दिया; अब उस उपदेश को जीवन में उतारना हमारी जिम्मेदारी है। यदि हम गुरु की आज्ञा का पालन करें और उनके बताए संयम एवं साधना के मार्ग पर चलें, तभी दीक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा।
उन्होंने कहा कि गुरुदेव कहीं गए नहीं हैं। पहले हम उन्हें केवल अपनी आँखों से देखते थे,आज वे देह की सीमाओं से परे होकर प्रत्येक साधक पर समान रूप से अपनी कृपा-दृष्टि बनाए हुए हैं। हमारी श्रद्धा,साधना और निष्ठा ही हमें उनके सान्निध्य का अनुभव कराती है। जब हम उनकी आज्ञा के अनुरूप जीवन जीते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो गुरुदेव स्वयं हमारा मार्गदर्शन कर रहे हों।
मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने पूरे जीवन में अपने लिए कुछ नहीं किया। उनका प्रत्येक क्षण धर्म, गुरु-परंपरा और समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहा। उन्होंने धर्म और संस्कृति की रक्षा करते हुए असंख्य लोगों को संयम और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। उनका सबसे बड़ा योगदान योग्य शिष्यों का निर्माण था। उन्होंने अनेक मुनि, आर्यिकाओं और ब्रह्मचारियों का निर्माण कर दिगंबर जैन परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की। उन्होंने सिखाया कि जीवन का वास्तविक सौभाग्य धन, वैभव या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि संयम, साधना, स्वाध्याय और धर्ममय जीवन जीने में है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान करते हुए कहा कि दीक्षा दिवस पर हमारा संकल्प यही होना चाहिए कि हम केवल गुरुदेव का गुणगान ही न करें, बल्कि उनकी आज्ञा का पालन करें। उनके बताए मार्ग पर चलें, धर्म को अपने जीवन का आधार बनाएँ तथा संयम, सेवा और साधना के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक बनाएँ। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इस अवसर पर मुनि श्री गरिष्ठसागर महाराज ने कहा कि गुरुदेव से हमारा संबंध शरीर का नहीं, आत्मा का है। यदि संबंध केवल शरीर से होता तो देह के साथ समाप्त हो जाता, किंतु आत्मा का संबंध शाश्वत और अमिट होता है। इसलिए आज भी गुरुदेव हमारे बीच हैं।वे देह से भले ही विदेह हो गए हों, पर उनके आदर्श, उनका आशीर्वाद और उनका सान्निध्य आज भी हमारे जीवन को आलोकित कर रहा है।उन्होंने कहा कि संसार में यदि दो ही बातें सर्वश्रेष्ठ हैं तो वे हैं—गुरु और प्रभु। प्रभु मौन रहते हैं, आत्मस्वरूप में स्थित रहते हैं, जबकि गुरु उस मौन का अर्थ समझाते हैं। गुरु ही हमें बताते हैं कि वीतरागता क्या है, आत्मा क्या है, मोक्ष का मार्ग क्या है और प्रभु के वास्तविक स्वरूप को कैसे समझा जाए। प्रभु आदर्श हैं, तो गुरु उस आदर्श तक पहुँचने की साधना सिखाते हैं। इसलिए गुरु के स्मरण मात्र से जीवन में आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है।मुनि श्री ने कहा कि हम सबका सौभाग्य है कि भले ही हमें आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज अथवा आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रत्यक्ष दर्शन का अवसर नहीं मिला, लेकिन उनके तेजस्वी शिष्य युगपुरुष आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का सान्निध्य प्राप्त हुआ। उनके माध्यम से हमें संपूर्ण गुरु-परंपरा का दिव्य आशीर्वाद मिला।
उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का वात्सल्य अद्भुत था। वे आशीर्वाद देते समय केवल सामने बैठे लोगों को ही नहीं, बल्कि सबसे पीछे बैठे व्यक्ति तक अपनी करुणा और कृपा पहुँचाते थे। उनके दोनों हाथों से बरसता आशीर्वाद उनकी सिद्ध साधना, निर्मल करुणा और निष्काम आत्मभाव का साक्षात् प्रसाद था।दीक्षा दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि गुरुदेव देह से दूर होकर भी आत्मा के अत्यंत निकट हैं। उनके बताए संयम, त्याग, तप और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि दोपहर 3 बजे श्री चंद्रप्रभु जिनालय में आचार्य गुरुदेव के चरण स्थापित किए गये! इसके उपरांत मुनिसंघ का मंगल विहार सागर की ओर हुआ

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शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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