मुक्ति का लक्ष्य तभी मिलेगा, जब भक्ति, अनुरक्ति और विरक्ति जीवन में आएँ : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

गिरीडीह। संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के आशीर्वाद तथा मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में मधुवन गुणायतन में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का समापन भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) के मोक्ष कल्याणक के भव्य आयोजन के साथ हुआ गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव केअंतिम दिवस कैलाश पर्वत की आकर्षक रचना की गई थी जिसमें सबसे ऊपर भगवान आदिनाथ को विराजमान किया गया था प्रतिष्ठाचार्य अशोकभैया एवं अभयभैया ने निर्वाण कल्याणक का भावपूर्ण मंचन किया तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भक्ति-भाव से सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि भगवान जिस लक्ष्य को लेकर संसार से निकले थे,उसकी पूर्णता मोक्ष प्राप्ति के साथ हुई। प्रत्येक जीव का परम लक्ष्य भी मुक्ति का ही होना चाहिए,लेकिन केवल मुक्ति की इच्छा पर्याप्त नहीं है, उसके लिए भगवान के बताए मोक्षमार्ग पर चलना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल में भले ही मोक्ष की प्राप्ति संभव न हो, लेकिन मोक्षमार्ग आज भी विद्यमान है।जो आज संयम, तप, साधना और आराधना के मार्ग पर आगे बढ़ेगा,वही भविष्य में मोक्ष का अधिकारी बनेगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पात्रता के अनुरूप धर्ममय जीवन अपनाना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में मुक्ति, भक्ति, अनुरक्ति और विरक्ति—ये चारों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।यदि मुक्ति चाहिए तो पहले भगवान के प्रति भक्ति जागृत करनी होगी।भक्ति से प्रभु के प्रति अनुरक्ति बढ़ती है और अनुरक्ति से संसार के प्रति विरक्ति स्वतः उत्पन्न होती है। पूर्ण विरक्ति ही अंततः मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि केवल घर, परिवार और व्यापार के बंधनों को ही नहीं, बल्कि आत्मा को बाँधने वाले कर्म बंधनों को भी पहचानना होगा। जिस दिन जीव को अपने वास्तविक बंधनों का बोध हो जाएगा, उसी दिन उसके भीतर मुक्त होने की तीव्र आकांक्षा जागृत होगी।मुनि श्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक प्रभाव तभी है जब जीवन की बुराइयाँ समाप्त हों।जिस प्रकार खरपतवार से भरी भूमि मेंअच्छे बीज नहीं पनपते,उसी प्रकार दोषों और दुर्गुणों को छोड़े बिना सद्गुणों का विकास संभव नहीं है। धर्म से श्रद्धा, उदारता, अहोभाव और पुण्यभाव में वृद्धि होनी चाहिए तथा छोटी-छोटी बातों को छोड़कर क्षमाशीलता और विशाल हृदय का विकास करना चाहिए।भगवान आदिनाथ के निर्वाण प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भरत चक्रवर्ती भगवान के मोक्ष पर इसलिए नहीं रोए कि भगवान मुक्त हो गए,बल्कि इसलिए रोये कि अब उन्हें भगवान के दर्शन और उपदेश का सौभाग्य नहीं मिलेगा। यही प्रभु के प्रति सच्ची भक्ति और अनुरक्ति का स्वरूप है।मुनि श्री ने पंचकल्याणक महोत्सव में श्रद्धालुओं के उत्साह और सेवा-भाव की सराहना करते हुए कहा कि गुणायतन में भगवान विराजमान कराने का अवसर महान पुण्य का परिणाम है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि महोत्सव समाप्त होने के बाद भी जीवनचर्या में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ तथा संयम, साधना और धर्म को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएँ।
इस अवसर पर मुनि श्री ने गुणायतन परिवार के साथ सभी कार्यकर्ताओ तथा प्रचार प्रसार से जुड़े समस्त मीडीया को अपना आशीर्वाद प्रदान किया प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतिम दिवस हवन के पश्चात भगवान आदिनाथ स्वामी के साथ सभी प्रतिष्ठित भगवान एक साथ
शोभायात्रा के रुप में निकाले गये जिसमें देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं नेउत्साहपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया। अंत में सभी 108भगवान का अभिषेक करके पारसधाम जिनालय में विराजमान किया गया एवं कलशारोहण का कार्यक्रम संपन्न हुआ

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शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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