अतुल कुमार जैन
शिवपुरी। नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाएगा। मंचों पर आदिवासी संस्कृति के गीत गूँजेंगे, नेताओं का स्वागत होगा और विज्ञापनों में विकास की तस्वीरें चमकेंगी। मगर शिवपुरी की सहरिया बस्तियों में यही दिन एक बड़ा सवाल लेकर आता है—जिस समुदाय के नाम पर दशकों से योजनाएँ और बजट खर्च हो रहे हैं, उनके घरों तक भरपेट भोजन, साफ पानी, बिजली, बेहतर इलाज और न्याय क्यों नहीं पहुँचा?
कभी सहरिया समुदाय का जीवन जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़ा था। वे महुआ, शहद, तेंदूपत्ता, जड़ी-बूटियों और खेती के सहारे जीवन यापन करते थे। आधुनिक विकास ने उनसे जंगल का रिश्ता तो छीन लिया, लेकिन बदले में उन्हें सुरक्षित आजीविका नहीं दी। आज उनके पास सड़कें और मोबाइल तो पहुँच गए हैं, पर खेत पर अधिकार, बच्चों के लिए पोषण और बीमारों के लिए अस्पताल अभी भी उनकी पहुँच से दूर हैं। आदिम युग से डिजिटल दौर तक पहुँचते-पहुँचते साधन तो बदले, लेकिन उनके शोषण का स्वरूप केवल बदल गया है।
शिवपुरी की सहरिया बस्तियों में कुपोषण कोई बीमारी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। बच्चों की उभरती पसलियाँ, खून की कमी से जूझती माताएँ और टीबी जैसे रोगों से टूटते शरीर सरकारी पोषण योजनाओं की जमीनी हकीकत बयां करते हैं। आँगनवाड़ी के रजिस्टर कागजों पर भरे जा सकते हैं, लेकिन खाली पेट आँकड़ों से नहीं भरते। किसी बच्चे की मृत्यु पर अधिकारी बीमारी का हवाला देते हैं, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि उस बच्चे के घर में बीमारी से पहले कितने दिनों तक चूल्हा नहीं जला था।
ग्वालियर-चंबल संभाग में आदिवासी उत्थान के नाम पर कई गैर-सरकारी संगठन सक्रिय हुए। देसी-विदेशी फंड से सर्वे हुए, कार्यशालाएँ आयोजित की गईं, तस्वीरें खिंचीं और रिपोर्टें तैयार हुईं। कुछ संस्थाओं ने निस्संदेह ईमानदार प्रयास किए होंगे, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सहरिया समुदाय के नाम पर आया धन उन तक कितना पहुँचा? यदि काम हुआ है, तो उसका सामाजिक अंकेक्षण ग्रामसभा के सामने क्यों नहीं होता? बस्तीवार खर्च और उनके परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
राजनीति ने सहरिया समुदाय को अधिकारों वाला नागरिक कम और उपयोग की वस्तु अधिक समझा है। चुनावी रैलियों में वे भीड़ का हिस्सा होते हैं, मतदान के दिन ईवीएम का बटन दबाने वाले ‘वोट’ और उसके बाद पाँच वर्षों तक भुला दिए गए चेहरे। पात्रता के बावजूद राशन न मिलना, बिजली-पानी के लिए भटकना और मजदूरी में शोषण की शिकायतें आम हैं। दबंगों ने परिवारों की जमीनों पर अवैध कब्जे कर रखे हैं। असली मालिक खसरा-खतौनी लेकर पटवारी, तहसील और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काटता है, जबकि कब्जेदार बेखौफ घूमते हैं।
सबसे गंभीर हमला शराब के जरिए हो रहा है। बस्तियों के आसपास अवैध शराब की बिक्री और उस पर प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। मजदूरी शराब में बह जाती है, शरीर टूटता है, परिवार उजड़ते हैं और असमय मौतें होती हैं। समुदाय को जानबूझकर कमजोर करने का आरोप जाँच का विषय हो सकता है, लेकिन अवैध कारोबार पर सरकारी मौन इस आशंका को और गहरा करता है। यह केवल नशा नहीं, बल्कि गरीबी को स्थायी बनाने वाला एक सुनियोजित शोषण प्रतीत होता है।
ठेकेदार को सस्ता मजदूर चाहिए, साहूकार को कर्जदार, दलाल को योजना का हिस्सा और नेता को वोट। जिसे भी अवसर मिलता है, वह सहरिया की गरीबी और अशिक्षा को लूट का जरिया बना लेता है। व्यवस्था उन्हें अधिकार संपन्न बनाने के बजाय निर्भर बनाए रखना चाहती है।
इस घोर अंधकार के बीच ‘सहरिया क्रांति आंदोलन’ उम्मीद की एक किरण बनकर उभरा है। आंदोलन के कार्यकर्ता बस्तियों में जनजागृति, नशामुक्ति, भूमि अधिकार और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता फैलाने में जुटे हैं। यह प्रयास स्पष्ट करता है कि सहरिया समुदाय अब मौन रहने को तैयार नहीं है।
इस विश्व आदिवासी दिवस पर केवल भाषण नहीं, बल्कि हिसाब चाहिए—पोषण का स्वतंत्र ऑडिट, राशन की सार्वजनिक निगरानी, अवैध शराब पर सख्त कार्रवाई, जमीनों से कब्जे हटाने की समयसीमा और एनजीओ तथा सरकारी फंड का खुला लेखा-जोखा। सहरिया को उत्सव का मुखौटा नहीं, बल्कि रोटी, जमीन, पानी, शिक्षा, इलाज और सम्मान चाहिए। इनके बिना विश्व आदिवासी दिवस केवल व्यवस्था के पाखंड का एक वार्षिक समारोह बनकर रह जाएगा।
अतुल कुमार जैन
शिवपुरी। नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाएगा। मंचों पर आदिवासी संस्कृति के गीत गूँजेंगे, नेताओं का स्वागत होगा और विज्ञापनों में विकास की तस्वीरें चमकेंगी। मगर शिवपुरी की सहरिया बस्तियों में यही दिन एक बड़ा सवाल लेकर आता है—जिस समुदाय के नाम पर दशकों से योजनाएँ और बजट खर्च हो रहे हैं, उनके घरों तक भरपेट भोजन, साफ पानी, बिजली, बेहतर इलाज और न्याय क्यों नहीं पहुँचा?
कभी सहरिया समुदाय का जीवन जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़ा था। वे महुआ, शहद, तेंदूपत्ता, जड़ी-बूटियों और खेती के सहारे जीवन यापन करते थे। आधुनिक विकास ने उनसे जंगल का रिश्ता तो छीन लिया, लेकिन बदले में उन्हें सुरक्षित आजीविका नहीं दी। आज उनके पास सड़कें और मोबाइल तो पहुँच गए हैं, पर खेत पर अधिकार, बच्चों के लिए पोषण और बीमारों के लिए अस्पताल अभी भी उनकी पहुँच से दूर हैं। आदिम युग से डिजिटल दौर तक पहुँचते-पहुँचते साधन तो बदले, लेकिन उनके शोषण का स्वरूप केवल बदल गया है।
शिवपुरी की सहरिया बस्तियों में कुपोषण कोई बीमारी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। बच्चों की उभरती पसलियाँ, खून की कमी से जूझती माताएँ और टीबी जैसे रोगों से टूटते शरीर सरकारी पोषण योजनाओं की जमीनी हकीकत बयां करते हैं। आँगनवाड़ी के रजिस्टर कागजों पर भरे जा सकते हैं, लेकिन खाली पेट आँकड़ों से नहीं भरते। किसी बच्चे की मृत्यु पर अधिकारी बीमारी का हवाला देते हैं, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि उस बच्चे के घर में बीमारी से पहले कितने दिनों तक चूल्हा नहीं जला था।
ग्वालियर-चंबल संभाग में आदिवासी उत्थान के नाम पर कई गैर-सरकारी संगठन सक्रिय हुए। देसी-विदेशी फंड से सर्वे हुए, कार्यशालाएँ आयोजित की गईं, तस्वीरें खिंचीं और रिपोर्टें तैयार हुईं। कुछ संस्थाओं ने निस्संदेह ईमानदार प्रयास किए होंगे, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सहरिया समुदाय के नाम पर आया धन उन तक कितना पहुँचा? यदि काम हुआ है, तो उसका सामाजिक अंकेक्षण ग्रामसभा के सामने क्यों नहीं होता? बस्तीवार खर्च और उनके परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
राजनीति ने सहरिया समुदाय को अधिकारों वाला नागरिक कम और उपयोग की वस्तु अधिक समझा है। चुनावी रैलियों में वे भीड़ का हिस्सा होते हैं, मतदान के दिन ईवीएम का बटन दबाने वाले ‘वोट’ और उसके बाद पाँच वर्षों तक भुला दिए गए चेहरे। पात्रता के बावजूद राशन न मिलना, बिजली-पानी के लिए भटकना और मजदूरी में शोषण की शिकायतें आम हैं। दबंगों ने परिवारों की जमीनों पर अवैध कब्जे कर रखे हैं। असली मालिक खसरा-खतौनी लेकर पटवारी, तहसील और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काटता है, जबकि कब्जेदार बेखौफ घूमते हैं।
सबसे गंभीर हमला शराब के जरिए हो रहा है। बस्तियों के आसपास अवैध शराब की बिक्री और उस पर प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। मजदूरी शराब में बह जाती है, शरीर टूटता है, परिवार उजड़ते हैं और असमय मौतें होती हैं। समुदाय को जानबूझकर कमजोर करने का आरोप जाँच का विषय हो सकता है, लेकिन अवैध कारोबार पर सरकारी मौन इस आशंका को और गहरा करता है। यह केवल नशा नहीं, बल्कि गरीबी को स्थायी बनाने वाला एक सुनियोजित शोषण प्रतीत होता है।
ठेकेदार को सस्ता मजदूर चाहिए, साहूकार को कर्जदार, दलाल को योजना का हिस्सा और नेता को वोट। जिसे भी अवसर मिलता है, वह सहरिया की गरीबी और अशिक्षा को लूट का जरिया बना लेता है। व्यवस्था उन्हें अधिकार संपन्न बनाने के बजाय निर्भर बनाए रखना चाहती है।
इस घोर अंधकार के बीच ‘सहरिया क्रांति आंदोलन’ उम्मीद की एक किरण बनकर उभरा है। आंदोलन के कार्यकर्ता बस्तियों में जनजागृति, नशामुक्ति, भूमि अधिकार और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता फैलाने में जुटे हैं। यह प्रयास स्पष्ट करता है कि सहरिया समुदाय अब मौन रहने को तैयार नहीं है।
इस विश्व आदिवासी दिवस पर केवल भाषण नहीं, बल्कि हिसाब चाहिए—पोषण का स्वतंत्र ऑडिट, राशन की सार्वजनिक निगरानी, अवैध शराब पर सख्त कार्रवाई, जमीनों से कब्जे हटाने की समयसीमा और एनजीओ तथा सरकारी फंड का खुला लेखा-जोखा। सहरिया को उत्सव का मुखौटा नहीं, बल्कि रोटी, जमीन, पानी, शिक्षा, इलाज और सम्मान चाहिए। इनके बिना विश्व आदिवासी दिवस केवल व्यवस्था के पाखंड का एक वार्षिक समारोह बनकर रह जाएगा।