सुख बाहर नहीं, आत्मा में है; शरीर साधन है, साध्य नहीं : मुनि श्री निर्णय सागर

विदिशा: आत्मिक सुख की तलाश और आत्मचिंतन का महत्व

विदिशा के इंद्रप्रस्थ स्थित श्री 1008 वासुपूज्य जिनालय में मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि मनुष्य जीवनभर सुख की तलाश में संसार के पदार्थों के पीछे दौड़ता रहता है, लेकिन वह यह विचार नहीं करता कि जिस सुख को वह बाहर खोज रहा है, उसका वास्तविक स्रोत कहां है। उन्होंने कहा कि व्यापार, नौकरी, धन-संपत्ति और भौतिक सुविधाओं में सुख तलाशते हुए जीवन बीत जाता है, फिर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। स्थायी सुख आत्मा में ही निहित है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री ने दैनिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और सही ज्ञान की ओर प्रेरित किया।

मुनि श्री ने कहा कि संसार में दिखाई देने वाली हलचल और परिवर्तन जड़ पदार्थों की स्थितियां हैं। सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति शरीर और उससे जुड़ी परिस्थितियों को समझते हुए उनके प्रति मोह कम करता है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि शरीर से अलग उसका अपना चेतन स्वरूप है, तभी आत्मतत्व को समझने की शुरुआत होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रश्न किया कि हम व्यापार, नौकरी या खेती क्यों करते हैं और धन क्यों कमाते हैं? हर प्रयास के पीछे सुख की इच्छा है, लेकिन यदि इन साधनों से स्थायी सुख मिलता, तो वर्षों के प्रयास के बाद भी मनुष्य बेचैन क्यों रहता? इसलिए यह विचार करना जरूरी है कि कहीं हम सुख की तलाश गलत स्थान पर तो नहीं कर रहे।

मुनि श्री ने एक वृद्धा का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक बार उसने प्रवचन में सुना कि कोई वस्तु खो जाए तो उसे प्रकाश में खोजना चाहिए। एक रात उसकी सुई झोपड़ी के भीतर गिर गई, लेकिन अंधेरे के कारण वह बाहर सड़क की रोशनी में उसे खोजने लगी। जब उससे पूछा गया कि सुई कहां गिरी है, तो उसने बताया कि अंदर। जब पूछा गया कि फिर बाहर क्यों खोज रही हो, तो उसने कहा कि महाराज ने प्रकाश में खोजने को कहा है। मुनि श्री ने समझाया कि यही स्थिति हमारी है। सुख भीतर आत्मा में है, लेकिन हम उसे बाहरी पदार्थों में खोज रहे हैं। धन और सुविधाओं के पीछे दिन-रात परिश्रम करने के बावजूद मन को स्थायी शांति नहीं मिलती। जैसे खोई वस्तु उसी स्थान पर मिलेगी जहां वह गिरी है, वैसे ही आत्मिक सुख भी भीतर ही तलाशना होगा।

शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने या डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वास्तविक शिक्षा मनुष्य को सजगता, जिम्मेदारी और विवेक सिखाती है। छोटी-छोटी बातों में भी लापरवाही हमारे जीवन की दिशा को दर्शाती है। अनावश्यक रूप से जलता बल्ब बंद करना या खुला नल बंद करना जैसे सामान्य कार्य भी जिम्मेदारी और जागरूकता का हिस्सा हैं।

मुनि श्री ने घोड़े और सवार का उदाहरण देते हुए कहा कि घोड़े पर बैठकर यात्रा करने वाला सवार होता है और घोड़े की सेवा करने वाला सईस। मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वह शरीर रूपी घोड़े का उपयोग कर रहा है या दिन-रात उसी की सेवा में लगा हुआ है। शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है, लेकिन शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेना अज्ञानता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर साधन है और आत्मा साध्य है। भोजन, धन और सुविधाएं शरीर की जरूरतें पूरी कर सकती हैं, लेकिन आत्मिक शांति नहीं दे सकतीं। संसार की जिम्मेदारियां निभाते हुए मनुष्य को आत्मचिंतन करना चाहिए कि वह कौन है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है और स्थायी सुख कहां है। जब मनुष्य शरीर और आत्मा का भेद समझकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है, तभी उसकी सुख की तलाश सही दिशा में आगे बढ़ती है। यही आत्मचिंतन जीवन को बाहरी भटकाव से निकालकर आत्मिक शांति की ओर ले जाता है।

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शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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