सुख की तलाश में दिशा का सही होना जरूरी: मुनि श्री निर्णय सागर महाराज
विदिशा। मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि संसार में मनुष्य जो कुछ भी कर रहा है, उसके पीछे का मूल उद्देश्य सुख की प्राप्ति है। कोई नया मकान, कार, बाइक, अच्छे कपड़े या व्यापार में अधिक लाभ चाहता है, तो कोई सांसारिक जीवन त्यागकर दीक्षा लेता है। सभी की आकांक्षा यही है कि जीवन सुखी हो और दुखों से मुक्ति मिले। मुनि श्री ने कहा कि यदि वर्षों के प्रयास के बाद भी मनुष्य सुखी नहीं है, तो उसे अपने प्रयासों और दिशा पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि जब किसी व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना होता है, तो सबसे पहले उसे रास्ते की जानकारी होनी चाहिए। यदि भोपाल जाना हो और रास्ते का सही ज्ञान न हो, तो घंटों गाड़ी चलाने के बाद भी मंजिल तक नहीं पहुंचा जा सकता। जीवन में भी सुख की मंजिल तो सभी चाहते हैं, लेकिन सुख का सही रास्ता क्या है, यह जानने का प्रयास बहुत कम लोग करते हैं। अनादिकाल से मनुष्य सुख के लिए निरंतर परिश्रम कर रहा है, सुबह से शाम तक काम में लगा रहता है, लेकिन भीतर का दुख समाप्त नहीं होता। ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि कहीं हमारी दिशा ही तो गलत नहीं है।
मुनि श्री ने कहा कि चौराहे पर पहुंचने के बाद वाहन की गति कम करना जरूरी होता है, क्योंकि वहां से कई रास्ते निकलते हैं और यह तय करना पड़ता है कि किस दिशा में जाना है। जीवन में भी कभी-कभी रुककर सोचना आवश्यक है। पहले सुनें, समझें, सही बात पर श्रद्धान करें, फिर उसे जानें और उसके बाद ही आगे बढ़ें। बिना दिशा जाने केवल तेजी से चलने से मंजिल जल्दी नहीं मिलती। उन्होंने एक व्यक्ति का उदाहरण देते हुए बताया कि वह लगातार भागे जा रहा था, लेकिन जब उससे पूछा गया कि कहां जाना है, तो उसने स्वीकार किया कि उसे स्वयं पता नहीं है। आज मनुष्य की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई है।
मुनि श्री ने नल की टोंटी का दृष्टांत देते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने दीवार पर टोंटी लगा दी और उम्मीद करने लगा कि उसमें से पानी निकल आएगा। जब पानी नहीं आया तो उसने दुकानदार को दोष दिया। दुकानदार ने समझाया कि टोंटी में पानी नहीं होता, वह केवल पानी आने का माध्यम है। इसके लिए पानी का स्रोत, पाइपलाइन, पंप और टंकी की व्यवस्था जरूरी है। यही भूल मनुष्य आध्यात्मिक जीवन में कर रहा है। हम सुख को मकान, वाहन, धन, मोबाइल और टीवी जैसी बाहरी वस्तुओं में खोज रहे हैं। इन साधनों से सुविधा तो मिल सकती है, लेकिन स्थायी सुख का स्रोत वे नहीं हैं। सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मा की अनुभूति और सही दिशा में जीवन जीने से प्राप्त होता है।
मुनि श्री ने कहा कि यदि अब तक के प्रयासों से स्थायी सुख नहीं मिला है, तो और तेजी से उसी दिशा में दौड़ने के बजाय रुककर विचार करना चाहिए। समस्या परिश्रम की कमी में नहीं, बल्कि सही दिशा की पहचान न होने में है। आचार्य भगवंतों द्वारा बताए गए सुख के मार्ग को समझकर जीवन में उतारने की आवश्यकता है। सही ज्ञान, सही श्रद्धा और सही आचरण के साथ आगे बढ़ने पर ही मनुष्य अपनी वास्तविक मंजिल की ओर बढ़ सकता है। बाहरी साधनों की दौड़ कभी समाप्त नहीं होती, लेकिन आत्मा की ओर बढ़ने वाला प्रत्येक कदम मनुष्य को भीतर की शांति के करीब ले जाता है।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से स्टेशन जैन मंदिर में आयोजित किए जा रहे हैं।


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