विदिशा में बच्चों को धर्म और संस्कारों से जोड़ने का आह्वान, मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने दिए जीवन के सूत्र
विदिशा। बच्चों को केवल शिक्षा और रोजगार के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है, उन्हें धर्म और संस्कारों से जोड़ना भी माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ये उद्गार मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने दि जैन बड़ा मंदिर में आयोजित प्रवचन के दौरान व्यक्त किए। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री ने अपने प्रवचन में बच्चों को धार्मिक संस्कार देने, धार्मिक आयोजनों में सहभागिता करने, क्रोध पर नियंत्रण रखने और आत्मस्वरूप के चिंतन को जीवन में उतारने का संदेश दिया।
मुनि श्री ने कहा कि समाज में शाम के समय संचालित होने वाली जैन पाठशालाएं बच्चों को धार्मिक ज्ञान और संस्कार देने का प्रभावी माध्यम हैं। यदि माता-पिता बच्चों को जिनवाणी और धर्म से परिचित करा दें, तो उनके जीवन की दिशा बदल सकती है। उन्होंने कहा कि संतान का पालन-पोषण, शिक्षा, विवाह और रोजगार की व्यवस्था करते हुए व्यक्ति संसार के अनेक दायित्व निभाता है, लेकिन यदि इसी के साथ बच्चों को जिनवाणी और धर्म का परिचय भी कराया जाए, तो जीवन के कर्मों को सही दिशा देने का अवसर मिलता है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को नियमित रूप से पाठशाला और धार्मिक गतिविधियों से जोड़ने का आग्रह किया।
विदिशा में निकाले गए भगवान के विमान महोत्सव की सराहना करते हुए मुनि श्री ने कहा कि धार्मिक आयोजनों में समाज की सक्रिय भागीदारी धर्म प्रभावना का माध्यम बनती है। उन्होंने ‘विमान’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए कहा कि जिनका मान निकल गया है, वे ‘विमान’ कहलाते हैं और जिनको विशेष मान प्राप्त है, वह भी विमान की संज्ञा से जुड़ता है। भगवान के विमान को निकालना समाज में धर्म के प्रति जागरूकता का कार्य है।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने आत्मा के स्वभाव और क्रोध जैसे कषायों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने पानी और अग्नि का उदाहरण देते हुए कहा कि अग्नि के संपर्क में आने पर पानी गर्म हो जाता है, लेकिन संपर्क हटते ही वह अपने स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार कर्मों के संयोग से आत्मा में क्रोध आदि विभाव परिणाम उत्पन्न होते हैं, लेकिन ये आत्मा का स्थायी स्वभाव नहीं हैं। उन्होंने हास्यपूर्ण ढंग से कहा कि क्रोध को लंबे समय तक बनाए रखना मनुष्य के लिए संभव नहीं है, क्योंकि यह आत्मा का स्वभाव नहीं, बल्कि विभाव है। व्यक्ति क्रोध में उबलता है और थोड़ी देर बाद पश्चाताप करने लगता है, लेकिन तब तक वह स्वयं और दूसरों को काफी नुकसान पहुंचा चुका होता है। इसलिए क्रोध आने से पहले ही अपने परिणामों को संभालने का प्रयास करना चाहिए।
मुनि श्री ने विदिशा के मंदिरों और धार्मिक वातावरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि भगवान शांतिनाथ के चरणों में साधना-आराधना का अवसर मिलना सौभाग्य की बात है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि जिनवाणी का केवल पाठ न करें, बल्कि समय निकालकर आत्मस्वरूप का चिंतन करें। उन्होंने कहा कि पर्व केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि अपने परिणामों की समीक्षा करने के अवसर हैं। यदि जीवन में कषाय उत्पन्न भी हो जाए, तो क्षमा मांगने और आत्मचिंतन के माध्यम से उसे समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि कार्यक्रम की शुरुआत आचार्य गुरुदेव की संगीतमय पूजन के साथ हुई, जिसमें सभी जिनालयों से प्रतिनिधित्व करते हुए अर्घ समर्पित किए गए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

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