सम्मेद शिखरजी में क्षमावाणी पर्व पर जुटे विभिन्न परंपराओं के संत, मुनि प्रमाण सागर ने दिया जीवन में क्षमा उतारने का संदेशसम्मेद शिखरजी में आयोजित क्षमावाणी कार्यक्रम में विभिन्न जैन परंपराओं के साधु-साध्वी एक मंच पर एकत्रित हुए। इस दौरान 'रुको, झुको, घुलो, मिलो' के संदेश के साथ क्षमावाणी का पर्व मनाया गया।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुनि प्रमाण सागर ने कहा कि क्षमा को केवल व्हाट्सऐप संदेश तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का व्यवहार बनाएं। उन्होंने क्षमा के वास्तविक अर्थ और जीवन में इसकी उप

सम्मेद शिखरजी के गुणायतन परिसर में सामूहिक क्षमावाणी पर्व का आयोजन, विभिन्न परंपराओं के साधु-संत एक मंच पर हुए एकत्रित

मधुबन/सम्मेद शिखरजी। तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी में विराजमान विभिन्न परंपराओं के साधु-साध्वियां रविवार को गुणायतन परिसर में एक मंच पर एकत्रित हुए और सामूहिक रूप से क्षमावाणी पर्व मनाया। इस आयोजन ने साधु-संतों के बीच आत्मीयता, समन्वय और परस्पर सम्मान का संदेश दिया। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज की प्रेरणा से आयोजित इस कार्यक्रम में सभी संतों ने मन, वचन और काय से जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा याचना की।

आचार्य श्री वैराग्यनंदी महाराज ने कहा कि लंबे समय से सभी साधु-साध्वियों की यह भावना थी कि एक मंच पर एकत्र होकर क्षमावाणी मनाई जाए। मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज की प्रेरणा से यह भावना साकार हुई है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन साधु-संतों के बीच आत्मीयता और समन्वय को मजबूत करने वाले हैं।

मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने क्षमावाणी के दर्शन को चार शब्दों—"रुको, झुको, घुलो, मिलो" में समाहित किया। उन्होंने कहा कि जीवन में आवेग, आवेश या क्रोध आने पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। कम से कम दस सेकंड रुककर तीन गहरी श्वास लें और विचार करें कि सामने वाले की बात प्रतिक्रिया देने योग्य है या विचार करने योग्य। उन्होंने कहा कि यदि बात सही है तो उसे स्वीकार कर झुक जाएं, और यदि सही नहीं है तो उसे सुनकर छोड़ दें, लेकिन मन में उसकी गांठ न बांधें। मन की गांठों का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि जिस तरह धागे में गांठें बढ़ने से वह छोटा होता जाता है, उसी तरह मन में पुरानी बातों को जमा करने से जीवन संकुचित हो जाता है।

मुनि श्री ने क्षमावाणी के वर्तमान स्वरूप पर चिंता जताते हुए कहा कि आज यह पर्व व्हाट्सऐप संदेशों तक सीमित होकर रह गया है। उन्होंने संदेश दिया कि "चीजों को फॉरवर्ड मत करो, जीवन को फॉरवर्ड बनाओ।" उन्होंने कहा कि क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों ही आसान नहीं हैं; क्षमा मांगने के लिए अहंकार छोड़कर झुकना पड़ता है और क्षमा करने के लिए दिल बड़ा करना पड़ता है। उन्होंने "घुलो और मिलो" के सूत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्ति का व्यवहार पानी में घुलने वाले नमक जैसा होना चाहिए, जो स्वयं को मिटाकर पानी का स्वाद बढ़ाता है।

मुनि श्री ने बताया कि सम्मेद शिखरजी स्वयं क्षमा का तीर्थ है और भगवान पार्श्वनाथ क्षमा के आदर्श हैं। उन्होंने इस सामूहिक प्रयोग को अनुकरणीय बताते हुए कहा कि यह परंपरा आगे भी जारी रहनी चाहिए। आचार्य श्री सम्भव सागर महाराज समारोह में उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने अपनी शुभभावनाएं और आशीर्वाद प्रेषित किया, जिसे मुनि श्री ने आयोजन की महत्वपूर्ण कड़ी बताया।

मुनि श्री ने साधुत्व की मर्यादा पर जोर देते हुए कहा कि साधु रत्नत्रय का प्रतीक होता है। उन्होंने कहा कि साधु अपनी अवस्था में और श्रावक अपनी मर्यादा में रहें तो अव्यवस्था का प्रश्न ही नहीं उठेगा। साधु-संतों को अपनी चर्या और मर्यादा के प्रति सजग रहना चाहिए, वहीं श्रावकों का दायित्व है कि वे साधु-साध्वियों की आराधना में सहयोग करें।

समारोह के दौरान उपस्थित साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने परस्पर क्षमा याचना की। कार्यक्रम का संचालन ब्र. अशोक भैया लिधौरा ने किया। इस अवसर पर मुख्य साध्वियों ने भी संबोधन दिया। गुणायतन परिवार की ओर से सभी साधु एवं साध्वियों को शास्त्र एवं श्रीफल अर्पित किए गए तथा सभी आगंतुकों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई।

सम्मेद शिखरजी में क्षमावाणी पर्व पर जुटे विभिन्न परंपराओं के संत, मुनि प्रमाण सागर ने दिया जीवन में क्षमा उतारने का संदेशसम्म

लेखक के बारे में

शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

0 फॉलोअर्स