मुनि श्री निर्णय सागर महाराज का संदेश: आत्मकल्याण के बाद ही रखें परकल्याण की भावना

विदिशा: आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर ही प्राप्त होता है वास्तविक सुख, मुनि श्री निर्णय सागर महाराज का प्रवचन

विदिशा स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर (स्टेशन) में आयोजित प्रातः कालीन धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को सबसे पहले अपने आत्मकल्याण का मार्ग अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण के बाद ही सामर्थ्य के अनुसार पर-कल्याण की भावना रखनी चाहिए। दूसरों के हित में कार्य करना अच्छी बात है, लेकिन ऐसा करते समय अपनी साधना और आत्मकल्याण की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्या वाणी’ ने बताया कि मुनि श्री ने अपने प्रवचन में आत्मकल्याण, मौन, स्वाध्याय, जिनवाणी और पाठशाला के माध्यम से संस्कार निर्माण का संदेश दिया। मुनि श्री ने कहा कि धर्म को केवल सुनने तक सीमित न रखकर उसे जीवन का अंग बनाने से ही आत्मिक संतोष और वास्तविक सुख की अनुभूति संभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैराग्य और जागरण के माध्यम अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ जीवों को उपदेश से मोक्षमार्ग की प्रेरणा मिलती है, तो कुछ लोग संसार की क्षणभंगुरता को समझकर स्वतः ही आत्मकल्याण की ओर बढ़ जाते हैं। किसी को प्राकृतिक दृश्य देखकर वैराग्य हो जाता है, तो कोई मृत शरीर देखकर संसार की नश्वरता समझ लेता है।

साधना के महत्व पर जोर देते हुए मुनि श्री ने कहा कि एक साधक को सबसे पहले अपनी दिनचर्या और मूल साधना पर ध्यान देना चाहिए। सामायिक, प्रतिक्रमण, वंदना, कायोत्सर्ग और स्वाध्याय साधना का आधार हैं। परोपकार तभी सार्थक है, जब वह अपनी साधना को कमजोर किए बिना किया जाए। उन्होंने अंग्रेजी की सूक्ति “Speech is silver, but silence is gold” का उल्लेख करते हुए मौन के महत्व को समझाया। आचार्य वीरसेन स्वामी का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि अनावश्यक बातचीत से बचना साधु जीवन की मर्यादा है। श्रद्धालुओं को भी संतों के पास जाकर आगम, धर्म और मोक्षमार्ग से संबंधित चर्चा करनी चाहिए।

स्वाध्याय पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि स्वाध्याय का अर्थ केवल ग्रंथ पढ़ लेना नहीं है, बल्कि पदार्थों और तत्त्वों को जानने की भावना तथा आलस्य का त्याग ही वास्तविक स्वाध्याय है। उन्होंने 28 प्रकार के कायोत्सर्ग की जानकारी देते हुए इन्हें आत्मसाधना का माध्यम बताया। भौतिक वस्तुओं के प्रति चिंता पर मुनि श्री ने कहा कि पैसा कमाने, उसकी सुरक्षा और नष्ट होने पर होने वाला दुख व्यक्ति को आकुल बनाता है। स्थायी सुख बाहरी वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि भीतर के संतोष में है।

पदयात्रा के अनुभव साझा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि पैदल विहार से समाज, प्रकृति और देश को करीब से देखने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य छोटी दूरी के लिए भी वाहनों पर निर्भर हो गया है, जबकि पैदल यात्रा जीवन को देखने और समझने का अलग अनुभव देती है।

मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से जिनवाणी और धर्म पाठशाला को जीवन का अंग बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि बच्चों को धर्म से जोड़ने के लिए माता-पिता को स्वयं भी धर्म शिक्षा से जुड़ना चाहिए। जब वे जिनवाणी का महत्व समझेंगे, तभी अपने बच्चों को उत्साह के साथ पाठशाला भेजेंगे। उन्होंने पुरुष और महिला पाठशालाओं के विस्तार पर जोर देते हुए कहा कि प्रतिदिन केवल 15 मिनट भी इसके लिए दिए जाएं तो सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज, शीतल विहार न्यास एवं चातुर्मास कमेटी के पदाधिकारी उपस्थित थे।

लेखक के बारे में

शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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