विदिशा में दशलक्षण धर्म के अंतर्गत त्याग धर्म पर मुनि श्री निर्णय सागर महाराज का प्रवचन
विदिशा में अग्रवाल धर्मशाला में आयोजित श्रावक संस्कार शिविर के आठवें दिन मुनि श्री निर्णय सागर महाराज ने त्याग धर्म पर श्रद्धालुओं को संबोधित किया। मुनि श्री ने त्याग के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि त्याग का अर्थ केवल किसी वस्तु को छोड़ देना नहीं है, बल्कि उसके प्रति भीतर की आसक्ति से मुक्त होना है। उन्होंने कहा कि यदि बाहरी वस्तु छूट जाए और मन उसी में लगा रहे, तो वह त्याग अधूरा है। वास्तविक त्याग तब है जब साधक परभावों से हटकर अपने आत्मस्वभाव में स्थित हो जाए।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री ने त्याग को समझाने के लिए सोने का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सोना कितना भी मूल्यवान हो, वह अपने स्वभाव यानी पीलेपन और भारीपन का त्याग नहीं कर सकता। इसी प्रकार आत्मा भी अपने स्वभाव और गुणों, जैसे ज्ञान और दर्शन का त्याग नहीं कर सकती। जो अपना है, उसका त्याग संभव नहीं है और जो अपना नहीं है, उसके प्रति मोह का त्याग करना ही साधना है।
मुनि श्री ने कहा कि अक्सर लोग रात का भोजन या अन्य वस्तुओं के त्याग को ही धर्म मान लेते हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वस्तु के साथ उसका मोह भी छूटा है। यदि वस्तु हाथ में नहीं है लेकिन मन में उसकी पकड़ बनी हुई है, तो वह केवल बाहरी त्याग है। उन्होंने शुद्ध उपयोग की अवस्था की ओर संकेत करते हुए कहा कि जब साधक सहज स्वोपयोग में आता है और आत्मस्वभाव में टिकता है, तब पर-पदार्थों से उसका संबंध स्वतः ढीला पड़ने लगता है।
साधु-संतों के जीवन का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि उन्होंने घर-परिवार, धन-संपत्ति और सांसारिक संग्रह का त्याग आत्मकल्याण के लिए किया है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि उत्तम त्याग धर्म का दिन केवल यह गिनने का अवसर नहीं है कि हमने क्या छोड़ा, बल्कि यह देखने का है कि हमारे भीतर क्या बचा है। उन्होंने धन के मोह, वस्तु के प्रति आसक्ति और आलस्य को त्यागने पर जोर दिया।
मुनि श्री ने कहा कि धन का त्याग करने से पहले धन के प्रति मोह का त्याग जरूरी है, वस्तु का त्याग करने से पहले उसके प्रति आसक्ति का त्याग जरूरी है और संसार का त्याग करने से पहले अपने भीतर के आलस्य एवं परभावों का त्याग जरूरी है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे अपने आप के निकट आएं और अपने स्वभाव में डूबें। जैसे-जैसे आत्मा अपने स्वभाव में स्थिर होगी, वैसे-वैसे पर का आकर्षण कम होता जाएगा और त्याग साधक के जीवन की सहज परिणति बन जाएगा।



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