"श्री सेवायतन द्वारा स्वास्थ्य शिविर लगाया गया जिसमें 350 ग्रामीणों का नि:शुल्क स्वास्थ्य परीक्षण किया गया"

गिरिडीह (श्री सम्मेद शिखरजी) के गुणायतन स्थित गौशाला परिसर में श्री सेवायतन संस्था द्वारा एक स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में मधुबन और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग स्वास्थ्य जांच के लिए पहुंचे। शिविर में करीब 350 लोगों ने अपना पंजीयन कराया, जिनका चिकित्सकों द्वारा स्वास्थ्य परीक्षण किया गया और जरूरतमंदों को नि:शुल्क दवाइयां उपलब्ध कराई गईं।

गुणायतन एवं श्री सेवायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि इस शिविर का मुख्य उद्देश्य मधुबन और ग्रामीण अंचल के लोगों को सहज और नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने जानकारी दी कि गुणायतन द्वारा 10 बिस्तरों वाला एक सेवाभावी अस्पताल भी संचालित किया जा रहा है। इस अस्पताल में दो योग्य चिकित्सक प्रतिदिन सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक ओपीडी में अपनी सेवाएं देते हैं। साथ ही, मरीजों के लिए तीन एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध है और आवश्यक दवाइयां भी नि:शुल्क प्रदान की जाती हैं। संस्था ने स्पष्ट किया है कि इन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किसी भी प्रकार का पंजीयन शुल्क नहीं लिया जाता है। गुणायतन एवं श्री सेवायतन परिवार ने स्थानीय निवासियों से इन सुविधाओं का लाभ उठाने की अपील की है।

पुण्य से मिले साधनों का सदुपयोग करें: मुनि श्री प्रमाण सागर

शिविर के दौरान आयोजित प्रात:कालीन धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को जीवन में जो भी सुविधाएं मिली हैं, जैसे शरीर, स्वास्थ्य, परिवार, धन, बुद्धि, शिक्षा और सम्मान, वे केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि उनके सदुपयोग के लिए हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि उसे क्या मिला है और वह उसका उपयोग कैसे कर रहा है।

मुनि श्री ने कहा कि दूसरों से तुलना करने से असंतोष बढ़ता है। व्यक्ति को अपने पास मौजूद उपलब्धियों और अनुकूलताओं का मूल्य समझना चाहिए। उन्होंने जीवन के विकास की तुलना पेड़ से करते हुए कहा कि जिस प्रकार पेड़ जितना ऊपर बढ़ता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होती हैं, उसी प्रकार व्यक्ति को ऊंचाई प्राप्त करने के साथ अपने संस्कारों और मूल्यों से जुड़े रहना चाहिए।

मुनि श्री ने आगे कहा कि पुण्य से प्राप्त साधनों का सदुपयोग ही जीवन की सार्थकता है। शरीर का उपयोग अच्छे कार्यों में, धन का दान और सेवा में, तथा बुद्धि का उपयोग स्वयं और समाज के कल्याण में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पुण्य से मिले संयोगों का केवल भोग करने से पाप कर्म का बंध हो सकता है, जबकि उनका सदुपयोग पुण्य की वृद्धि का कारण बनता है। उन्होंने लोगों को प्रेरित करते हुए कहा कि संसार की भागदौड़ के बीच व्यक्ति को अपने आत्मकल्याण के लिए भी समय निकालना चाहिए और जीवन की दिशा को समय रहते पहचानना आवश्यक है।

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शोभित जैन

@jainshobhit5

विदिशा REPORTER

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